“पाँचवी और छठवीं अनुसूची” आदिवासियों के लिये किसी “धर्मग्रंथ” से कम नही है।

संविधान की “पाँचवी और छठवीं अनुसूची” 'अनुसूचित जनजाति'  के लिये किसी “धर्मग्रंथ” से कम नही है । क्योंकि 'अनुसूचित जनजाति'  के सुरक्षा और हित की तरफदारी इन्ही कानूनो मे निहित था । “पाँचवी और छठवीं अनुसूची” संविधान की पुस्तक मे “शव्दो” के रूप मे सत्तर वर्षों से कैद पड़ा है जिसे आजतक 'अनुसूचित क्षेत्र' Schedule Area के लोगो ने उसका स्वाद नही चखा । आज भी 'अनुसूचित जनजाति' Schedule Tribe अपने संविधान पर पूर्ण आस्था और श्रद्धा रखता आया है । लेकिन अब उनका सब्र टूटता नज़र आ रहा है ।

मारँग गोमके “जयपाल सिंह मुण्डा” ने संविधान प्रस्तावना के वक्त उस बड़े बहस मे पूरे सभा मे कहा था - " आप आदिवासियों को लोकतंत्र के बारे मे नही सीखा सकते , आपको लोकतांत्रिक तरीका उनसे सीखना पड़ेगा । वे इस पृथ्वी के सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक लोग है । हमारे लोग सुरक्षा के पर्याप्त साधन नही ,सुरक्षा चाहते है । हम कोई विशेष सुरक्षा नही चाहते , हम चाहते है की हमे भी अन्य भारतीय की तरह समझा जाये ।"

भारत के संविधान की "पाँचवी और छठवीं अनुसूची" (Fifth & Sixth Schedule) का मूल प्रारूप 'अनुसूचित जनजाति'  की सामाजिक ,सांस्कृतिक , भाषायिक ऐवम आर्थिक अस्तित्व की सुरक्षा का अति महत्वपूर्ण प्रावधान है । 'पाँचवी और छठवीं अनुसूची' की अवधारणा अनार्य 'ऑस्ट्रिक भाषाई एवं प्रजाति समूह ' के लोगो  के हजारों वर्ष पूर्व भारत मे आगमन काल से लेकर भारत के विभिन्न हिस्सों मे विभाजित होने तथा जंगलों और पहाड़ को अपना आश्रय बनाकर एक विशिष्ट सभ्यता को विकास करने की पूरी प्रक्रिया के अध्ययन के पश्चात उनकी भाषा ,संस्कृति ,परम्पराओं ऐवम जल ,जंगल और ज़मीन पर आधारित उनकी अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिये बनाया यह कानून गया था । इस कानून मे सिर्फ इतना ही नही वरन आदिवासियों की विशिष्ट सामाजिक ऐवम पारम्परिक व्यवस्था की रक्षा के लिये सशक्त “जनजातीय प्रशासनिक तंत्र” को भी मान्यता दी गई थी । लेकिन इसे दुर्भाग्य कहे या प्रशासनिक लापरवाही की आज तक आदिवासी क्षेत्रों मे आदिवासियों के हित मे बने संविधान के इस प्रावधान को जिसे पाँचवी और छठवीं अनुसूची कहते है आज तक लागू नही किया गया ।

“पाँचवी और छठवीं अनुसूची” की अवधारणा आदिवासी जन जीवन और उनकी जीवन शैली की गहराइयों ऐवम उनकी मूल भावना के साथ जुड़ी हुई है इसे इतने हल्के ढंग से समझते हुये इनकी अवहेलना करना कई दूरगामी प्रतिकूल प्रभावों को जन्म दे सकता है जो आदिवासी क्षेत्रों के नवनिर्माण के लिये बाधक साबित हो रहा है । भारत के आजादी के पूर्व भारत मे आदिवासियों की अपनी विशिष्ट संस्कृति ,परम्परा और उनके भाषाओं के संरक्षण के लिये भारत के प्रांतीय प्रशासन के गठन की माँग को लेकर कई आंदोलनो के कारण भारत के संविधान निर्माताओं ने भारत के आदिवासियों के विकास की अवधारणाओं को परिभाषित किया । उनके अनुरूप संविधान मे एक अलग प्रारूप तैयार किया गया था । लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों ने पूँजी निवेश की अवधारणाओं के कारण उपनिवेशवादी प्रकिया को ही बल दिया तथा अंतराष्ट्रीय विकास नीतियों के कारण आदिवासियों के हित मे बने कानून की मूल भावना अब बिखरती हुई दिखाई पड़ रही है ।

इन दो हजार वर्षों के दरमियान पूरे विश्व मे कई परिवर्तन हुये लेकिन इस नये युग मे स्वतंत्र भारत की संविधान की जनतंत्र या लोकतंत्र की आत्मा को जैसे झकझोर कर रख दिया है । भारत के आजादी के उपरांत नये आर्थिक नीतियों के तहत विश्व स्तर पर बनने वाले खुले बाजार की नीतियों ने भारत के आदिवासियों की सामाजिक , सांस्कृतिक अस्तित्व की सुरक्षा का एक बड़ा समस्या खड़ी कर दी है । देशी विदेशी व्यवसायिक कम्पनियों के बड़े पैमाने पर आदिवासी क्षेत्रों मे पूँजी निवेश के कारण संविधान के अस्तित्व का ही संकट खड़ा हो रहा है । आदिवासियों की जीविका का प्रमुख स्रोत जल ,जंगल और ज़मीन की सुरक्षा के लिये बनाये गये सँवेधानिक प्रावधनों की उपेक्षा के कारण आदिवासियों के हाथो से बड़े पैमाने पर ज़मीन और जंगल पर मालिकाना हक अब उनके हाथो से निकलता जा रहा है । इतना ही नही इनके क्षेत्रों मे विकास के नाम पर उनकी ज़मीन छीन कर उन्हे विस्थापित किया गया जिसके कारण उन्हे अपने रोज़ी रोटी के लिये पलायन झेलना पड़ रहा है ।

 

- राजू मुर्मू

Comments

BHAVIK PARGEE's picture

हमें पांचवी अनुसूची ही चाहिये

गर्व से कहता हूं मैं गोंड आदिवासी हु

संविधान लाग् करो

संविधान लाग् करो

संविधान लाग् करो

संविधान बना है तो उसे लागू क्यो नहीं करते, क्या इसके लिए फिर से आंदोलन करना पड़ेगा? अगर यही चाहते हैं तो यही सही। मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं गोंड़ हूँ।

Yes I am agree with you

हमे साहिए हमारा संविधानिक हक और अधिकार

पाँचवी और छठवी अनचसुची।

MOBILE NO: 
7990359370

पाँचवी छठवी अनुसुची के तहत हमे चाहिए

भील प्रदेश
जिसकी राजधानी होगी मानगढधाम

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7575036108
e-Mail: 
Tapaswibhil@gmail.com

अपने संस्कृति को न भूलें

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7566259883

Hame lad kr apna adhikar Basil karna huga
Mai Garv se kahta hu mai adivasi hu?

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mukeshnargave6266@gmail.com

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