भारतीय संविधान में 'पांचवी अनुसूची' के अनुच्छेद 244 (1) अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण

अनुसूचित क्षेत्र के ‘आदिवासी समाज’ शिक्षित होने के बाद भी अपने अधिकारों के प्रति अनिभिज्ञ है ! ‘Tribal Development’ तथा ‘Security ‘के लिए ‘भारत के संविधान में दर्जनों प्रावधानों के बावजूद इनका अपेक्षित लाभ इन्हें नहीं मिल रहा है। संविधान प्रदत्त अधिकारों की उपेक्षा लंबे अरसे से की जा रही है , लेकिन ‘आदिवासी समाज’ में जो ‘शिक्षित वर्ग’ संविधान के प्रावधानों की जानकारी रखता है , उनमे इच्छाशक्ति का इतना अभाव है की वे समय समय पर संविधान के उपेक्षा के कारण उत्पन्न होने वाले अनुकूल परिणामो को महसूस करते हुए भी समस्याओं की दिशा में कोई पहल नहीं करते। यह हमारी विडम्बना रही है - " जो जानते है ! वे बोलते नहीं और जो बोलते है वो जानते नहीं”। आदिवासियों की दुर्दशा का शायद यही कारण हो सकता है ! शायद इसीलिए झारखण्ड राज्य बनने के बाद भी वहां के आदिवासियों को उनके अधिकारों से वंचित किया गया है। आदिवासियों अपने पूर्वजो का शत - शत नमन करना चाहिए , जिनके कठिन संघर्षो एवं दूरदृष्टि के कारण आज ‘आदिवासी समाज’ का अस्तित्व जीवित है। मैं समझता हूँ की झारखण्ड राज्य के गठन के बाद भी 'ट्राइबल डेवलपमेंट' का रोना हमारी अपनी गलती है। हमें इस गलती को स्वीकारना होगा। हमें इस बात को सोचना चाहिए कि राज्य का मुख्यमंत्री कौन बना ? संविधान में दिए गए प्रावधानों के अनुपालन की जिम्मेवारी निश्चित तौर पर उन आदिवासी राजनेताओं की थी, जिन्हें राज्य चलाने का जनादेश आम जनता ने दिया और सरकार की कुर्सी पर सम्मान के साथ बिठाया गया। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं होता की हमारे ट्राइबल्स नेताओं ने अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं किया। इसे जानबूझ कर अपनी उपेक्षा कहे या अज्ञानता। जिस संविधान को गढ़ने में संविधान निर्माताओं को करीब 185 वर्ष लगे हो , उनकी गंभीरता ऐसे ही समझ में आती है। इन 185 सालो में संविधान निर्माताओं ने दिन-रात मेहनत करके ट्राइबल समाज के सामाजिक , राजनितिक , आर्थिक एवं अस्मिता से जुड़े हुए पहलुओं को एकत्रित कर ट्राइबल्स के हित में संविधान निर्माण की जिम्मेदारी को पूरा किया। इसके बाद यदि संविधान का मकसद आजादी की 70 सालो में धूमिल हो जाए तो यह एक गंभीर समस्या है। इस पर चिंतन की आवश्यकता है।

भारतीय संविधान में 'पांचवी अनुसूची' के अनुच्छेद 244 (1) अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के अधिकार का कानून है। लेकिन विडम्बना यह है की इस कानून को पूर्णरूप से आज तक लागु नहीं किया गया ! भारत के नौ प्रांतो में कई अनुसूचित क्षेत्र है लेकिन आज भी वहां के आदिवासियों को अपने ही क्षेत्र में अपना ‘एडमिनिस्ट्रेसन ’ और ‘कंट्रोल’ प्राप्त नहीं है। भारत में शासन का नियंत्रण दो तरीके से होता है। पहला ‘लोकल इलेक्शन’ के उपरांत सांसद , पार्षद के माध्यम से और दूसरा ‘राष्ट्रपति’ के द्वारा। अनुसूचित क्षेत्र का नियंत्रण सिर्फ भारत के ‘राष्ट्रपति’ और भारत के ‘प्रांतीय राज्यपाल’ के द्वारा होता है। ‘अनुसूचित क्षेत्र’ (शेड्यूल फाइव एरिया) में इलेक्शन कराये जाने का कोई प्रावधान नहीं है क्योंकि 'पांचवी अनुसूची' भारत के आदिवासी क्षेत्रो पारम्परिक ‘ग्रामसभा’ का अपना नियंत्रण और प्रशासन होता है। ‘पांचवी अनुसूची’ का कानून के अनुसार इस क्षेत्र में कोई भी किसी भी तरह का संसदीय चुनाव या पार्षद पद का कोई औचित्य ही नहीं है क्योंकि सारा नियंत्रण सिर्फ 'ग्रामसभा' के जरिए किया जाना था । लेकिन फिर भी इन क्षेत्रों में असंवैधानिक तरीके से चुनाव कराकर अनुसूचित क्षेत्र के लोगो से नियंत्रण और प्रशासन उनके हाथो से छीन लिया गया। भारत के सभी राज्यों में राज्य से संबंधित संवैधानिक सामान्य कानून लागु है और वे सुचारु रूप से चल रहे है लेकिन ‘पांचवी अनुसूची’ अभी भी अधर पर लटका हुआ है, यही कारण है की इन क्षेत्रों में कई राजनितिक दल जोंक की तरह चिपक कर ‘अनुसूचित क्षेत्र’ के लोगो के अधिकारों को चूस रहा है ! लीडर बन कर सभी इतराते है लेकिन जब पांचवी अनुसूची की बात करो तो सबको साँप सूंघ जाते है ! जुबान पर ताला जड़ जाता है ! ऐसे नक्कारे लीडर की अब कोई आवश्यकता नहीं। 'सिलेटसाफ' नेताओं की अब कोई जरुरत नहीं। काम का ना काज का दुश्मन अनाज का ! कोई मंत्री या राजनेता अनुसूचित क्षेत्र के विषय पर बोलने से कतराते है। ‘पांचवी अनुसूची’ के संवैधानिक कानून के विषय में आज लोगो के बीच किसी राजनितिक दलो ने कभी जिक्र तक नहीं किया। जुबान मानो सील जाते है इनके ! ये क्यों बताएँगे ? इन्हें पता है की जिस दिन अनुसूचित क्षेत्र के लोगों को अपने निजी कानून और अधिकार के बारे में ज्ञान हो गयाउस दिन इन राजनीतिक दलो को यहाँ से बोरिया बिस्तर बांध कर भागना पड़ेगा। मैं तो कहता हूँ की 'पाँचवी अनुसूची' को आज ही लागु करे फिर देखिये कैसे इस प्रकार की समस्या का अंत होता है या नहीं ! संविधान की 'पांचवी अनुसूची' के प्रावधानों को पिछले 70 वर्षों में अमल में नहीं लाया गया। यह एक गंभीर मामला है।

‘पांचवी अनुसूची’ क्षेत्र में आदिवासियों के बीच नियंत्रण एवं प्रशासन के लिए 'पि –पेसा' या 'पेसा कानून' 1996 की धारा 4(0) के तहत ‘स्वायतशासी परिषद्’ का नियमावली राज्य सरकार को बनाना था , जो विधि सम्मत था लेकिन आजतक लागु नहीं किया गया। । आदिवासियों के कल्याण एवं उन्नति के लिए संविधान का अनुच्छेद 275 (1) के तहत ‘केंद्रीय कोष’ की व्यवस्था है पर आज सामान्य क्षेत्र का कानून लागू कर आदिवासियों को असीमित कोष से वंचित किया जा रहा है। आदिवासी इलाकों के शांति एवं सुशासन के लिए अपवादों एवं उपन्तारणों के अधीन रहते हुए ‘ग्राम सभा’ को सारे अधिकार दिया जाना था लेकिन पुलिस कानून, कोर्ट व्यवस्था, प्रखंड व्यवस्था आदि आज इसी व्यवस्था का बोलबाला है। भारत का संविधान आदिवासियों के बीच शांति और सुशासन देने की बात कहती है। यानि यह ‘सामान्य कानून व्यवस्था’ अनुसूचित क्षेत्र के लिए नहीं है। फिर भी आज हम इसी व्यवस्था से शासित हैं ! कितनी विडंवना है की यह हमारा देश भारत है और सभी आदिवासी राज्य झारखण्ड, छत्तीसगढ़ आंध्र प्रदेश, गुजरात ,हिमाचल प्रदेश ,मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र , ओडिसा ,राजस्थान जहाँ आदिवासियों की संख्या सघन है उन्हें उनके हक़ और संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा गया। है । दुःखद बात यह है कि पिछले 10 वर्षों में सरकार ने उद्योगपतियों को निमंत्रण देकर सरकारी खजानो से विज्ञापन तक दे रहे है, बुला रहे है हमारा झारखण्ड , हमारा छत्तीसगढ़ ,हमारा मध्यप्रदेश टाइटल होता है ' द अपोरच्युनिटी ऑफ़ लेंड ' कमाल है ! किसके लिए ? आदिवासियों के लिए या उद्योगपतियों के लिए ? संवैधानिक कानून का हनन कौन कर रहा है ? कहते है की देश का संविधान सर्वोपरि है फिर आज तक आदिवासी क्षेत्रो के कानून को 70 वर्षो से लंबित करने का क्या प्रयोजन है ?

अधिकांश उद्योग अनुसूचित क्षेत्रों में स्थापित होने वाले हैं एक लाख एकड़ से भी अधिक आदिवासियों की जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। अब प्रश्न ये उठता है की जब कोई भी ‘अनुसूचित क्षेत्र’ में जमीन अधिग्रहण नहीं कर सकता तो फिर कैसे किसी बाहरी व्यक्ति को जमीन मुहैया किया जा रहा है ? कौन लोग है जो इन उद्यमियों को जमीन बेच रहा है ? 'ग्रामसभा' के सहमति के बगैर कैसे कोई इन आदिवासियों की जमीन खरीद सकता है ? सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए की रैयती जमीन को ले जाने से आदिवासियों का विस्थापन हो रहा है। 'पांचवी अनुसूची' का कानून के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र में राजनितिक दलों एवं चुनाव का पूर्ण निषेध है। 'पांचवी अनुसूची' आदिवासियों के अस्तिव और जीवन को संरक्षित करने का एक मात्र उपाय है, और इसे जल्द से जल्द पूर्णरूप से इन क्षेत्रो में लागु किया जाना चाहिए।

- राजू मुर्म

Comments

पुना पैक्ट 1932 में अनुसूचित क्षेत्रों मे चुनाव सम्बन्धी कोई भी चर्चा नहीं की गई इसलिए संविधान मे भी अनुसूचित क्षेत्रों मे आम चुनाव करवाने संम्बधी कोई भी बातों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है...फिर भी हमारे ही आदिवासी स्वयं इस दलदल मे घुसकर समान्य ब्यवस्था को स्वीकृति देने की वजह से पांचवी अनुसूची के प्रावधानों को लागू करा पाने मे स्वयं आदिवासी ही बाधक बना हुआ है......अतः अनुसूचित क्षेत्रों मे आम चुनाव को समाप्त करने से ही पांचवी अनुसूची के तहत आदिवासियों के प्रशासन एवं नियंत्रण कायम किए जा सकते हैं...

Ha sahi h..hamare sabhi log jante huye bhi kuch ni karte or Na hi sahi ka support karte h...PTA ni inhe kab inki oukaat PTA chalega..PTA ni ye kab so ke jagenge

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आदिवासी समाज के लोग शिक्षित तो हैं, किंतु जागरुक नहीं, इन्हें जागरुक होने ही नहीं दिया जाता, थोड़ी सी प्रलोभन में ही हमारा समाज झुका हुआ है,
समाज के शिक्षित लोग लालच छोडकर समाज के लिए चिंतन करें, बहुत बडे विद्वान हैं समाज में!
बहुत कुछ किया जा सकता है लेकिन करना नहीं चाहते हैं
आज की स्थिति ऐसी है कि समाज दलदल में प्रवेश कर रहा है जिसके लिए जिम्मेदार समाज प्रतिनिधित्व करने वाले हैं इनकी सोंच है कि अगर समाज के और लोगों में जाग्रति आ जाएगा तो हम कुछ नहीं कर पाएंगे,
लेकिन कुछ समाज के चिंतक प्रयास कर रहे हैं ज्यादा वक्त नहीं लगेगा, हमारा पूरा प्रयास है कि समाज के हर वर्ग तक जानकारी पहुँचा सकें हर ब्यक्ति तक संविधान की जानकारी बताएं

दिनेश श्याम

बिलकुल सही कहा सर

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Nice

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its very useful article submitted by You and i hope all peoples take benefit and applied in their further life...
JOHAR

It gives me an immense pleasure that this young tribal brigade doing great job for our tribal society. All please stay connected and raise your voice for welfare of tribalism. I salute you people, u are not less than army people.

अादिवासी

आपने बहुत ही उचित कहा है I परंतु यह उम्मीद करना कि कोई आएगा , हमें बचाएगा I ऐसा कभी नहीं होगा I किसी राजनैतिक पार्टी से उम्मीद नहीं, झारखण्ड नामधारी पार्टी से तो बिलकुल नहीं I हमें - आपको ही आगे आना पड़ेगा I पत्र - पत्रिकाओं में लेखों के माध्यम से अपना दुःख अथवा गुस्सा निकालने से ज्यादा कुछ नहीं होगा I संविधान निर्माण से पहले और बाद के वर्षों में भी आदिवासियों के अधिकार एवं उनके शोषण - अत्याचार से सम्बंधित लेख यदा - कदा छपते रहे हैं किन्तु कितने आदिवासियों को ये बात आज तक समझ में आयी है I आज भी देख लीजिये - कितने आदिवासी पढ़े - लिखे हैं , कितने आदिवासी समाचार - पत्र या अन्य पत्रिकाएं पढ़ते हैं अथवा उन्हें खरीदकर पढ़ने की हैसियत है I भारतीय संविधान का संरक्षक (Custodian) भारत का सर्वोच्च न्यायालय है I पाँचवी, छठवीं एवं आदिवासियों के हित से सम्बंधित किसी भी संवैधानिक अधिकार के उल्लंघन एवं संविधान सम्मत उनके कार्यान्वयन के लिए वैसे तो भारतीय संविधान के nominal care taker - भारत के राष्ट्रपति एवं भारतीय संविधान के संरक्षक (Custodian) - भारत के सर्वोच्च न्यायालय को , वर्षों पहले ही स्वत: संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई करना चाहिए था I किन्तु बहुत ही दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि ऐसा नहीं हुआ I अनुसूचित क्षेत्रों वाले राज्यों के अब तक के राज्यपालों के लिए यह कहना क्या उचित नहीं है कि उन्होंनें अपने कर्तव्यों एवं जिम्मेवारियों का संविधान सम्मत , उचित पालन नहीं किया है और शायद , ऐसा जान - बुझ कर (intentionally ) न करके संविधान का उल्लंघन किया है I संविधान के उल्लंघन को क्या नाम दिया जाय आप पाठक अच्छी तरह समझते हैं I क्योंकि उपर्युक्त विषयों के कार्यान्वयन एवं अनुपालन हेतु सम्बंधित राज्यों के राज्यपाल ही पूर्णरूपेण जिम्मेवार हैं I अधिकारों - विशेष कर पाँचवी, छठवीं एवं आदिवासियों के हित से सम्बंधित किसी भी संवैधानिक अधिकार के अनुपालन हेतु क्यों न सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाय , क्या कोई साथ है ?
विजय आईन्द मुण्डा, राँची आदिवासी समाज ।।

बिकाश के लिए संकीर्ण मानसिकता को त्यागना होगा । अगर हम आदिबासी समाज आदिबासी बहुल क्षेत्र में पाँचवी, छठवीं अनुसूची के नाम पे जातिबादी बिचारधारा को प्रोत्साहन देंगे । तो हमारे जाती के लोगो का दूरगामी भबिश्य अंधकार के गरथ में होंगे। बिस्व इतिहास के मंथन से हमें ये पता चलता है की बिकाश के लिए उन्मुक्त बिचारधारा की अति आबशक्ता है ।जिन राज्यो में छठवीं अनुसूची लागु है उन राज्यो का बिकाश कम हुये तुलनात्मक उन राज्यो का जहा छठवीं अनुसूची लागु नहीं है । उदहारण पुरबोत्तर राज्य । बर्तमान राष्ट्रपति तथा राज्यपाल को कोसने से हमारे बिकाश नहीं होगा ।इन संकीर्ण मानसिकता से नक्सलबाद एबं देशद्रोही बिचारधारा को प्रोत्शाहन मिलता है । हम आदिबासी समाज के मुख्या समश्या है नसा करना एबं बैदिक हिन्दू धर्मं को न मानना , जिसके कारण हमारे समाज में बौदिक् बिकास एबं आध्यात्मिक उन्नति के अभाव में हम दूसरे जाती से पिछडे हुए है । अगर हम बिकास चाहते है तो हमे अन्य जाती से आपसी प्रेम एबं भाइ-चारे के साथ उनके आच्छे गुणों एबं उन्नत बिचारो को अपनाऐं । जिससे हमारे संभिधान का रक्षा हो और हमारे अगले पीढ़ी उच्च बिचारधारा के साथ अपना बिकाश कर सके । न की पाँचवी, छठवीं अनुसूची का रोना रोके( समुद्र के बिच टापू जैसे )उन्नत समाज से अलग- थलग एक कोने में पड़े रहे । और इस प्रकार के जातिबाद को प्रोत्साहन देना भी एक प्रकार का राजनितिक सोसन ही तो है। हमे याद रखने होंगे आज जितने भी उन्नत तकनीक का बिकास हुए ओ किसी एक समाज या एक देश ने नहीं किये है । इसलिए हमें संकीर्ण मानसिकता को त्यागने होंगे।
जय जोहार!

<p>5th &amp;6th schedule ke purnatah lagu hone pr hi hm&nbsp; aadiwaasiyo ka vikas sambhav hai kyonki tab ham log&nbsp; puri tarah se prashashan ko controle kar apne tarike se kaary karenge vo bhi bina kisi bhedbhaav ke bina kisi paakhand ke.isliye mai aapki abhimat se sahmat nhi hoon.aap ko yadi lagta hai ki jo bhi aadiwasi bhai jo bhi aadiwaasi sangthan samaaj ko ekjut karne va jaagruk karne tatha apni rudhi pratha riti rivaajo sanskritik paramparaao aadi ki raksha or badhaave ki baat kar rahe hai vo samaj ka aadiwaasi logo kaa vikas nhi chaate hai .???</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>to aapki ye soch galat hai ........jai aadiwaasi ....jai bhil.....jai bhagwaan birsaa</p>
<p>&nbsp;</p>

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बिकाश के लिए संकीर्ण मानसिकता को त्यागना होगा । अगर हम आदिबासी समाज आदिबासी बहुल क्षेत्र में पाँचवी, छठवीं अनुसूची के नाम पे जातिबादी बिचारधारा को प्रोत्साहन देंगे । तो हमारे जाती के लोगो का दूरगामी भबिश्य अंधकार के गरथ में होंगे। बिस्व इतिहास के मंथन से हमें ये पता चलता है की बिकाश के लिए उन्मुक्त बिचारधारा की अति आबशक्ता है ।जिन राज्यो में छठवीं अनुसूची लागु है उन राज्यो का बिकाश कम हुये तुलनात्मक उन राज्यो का जहा छठवीं अनुसूची लागु नहीं है । उदहारण पुरबोत्तर राज्य । बर्तमान राष्ट्रपति तथा राज्यपाल को कोसने से हमारे बिकाश नहीं होगा ।इन संकीर्ण मानसिकता से नक्सलबाद एबं देशद्रोही बिचारधारा को प्रोत्शाहन मिलता है । हम आदिबासी समाज के मुख्या समश्या है नसा करना एबं बैदिक हिन्दू धर्मं को न मानना , जिसके कारण हमारे समाज में बौदिक् बिकास एबं आध्यात्मिक उन्नति के अभाव में हम दूसरे जाती से पिछडे हुए है । अगर हम बिकास चाहते है तो हमे अन्य जाती से आपसी प्रेम एबं भाइ-चारे के साथ उनके आच्छे गुणों एबं उन्नत बिचारो को अपनाऐं । जिससे हमारे संभिधान का रक्षा हो और हमारे अगले पीढ़ी उच्च बिचारधारा के साथ अपना बिकाश कर सके । न की पाँचवी, छठवीं अनुसूची का रोना रोके( समुद्र के बिच टापू जैसे )उन्नत समाज से अलग- थलग एक कोने में पड़े रहे । और इस प्रकार के जातिबाद को प्रोत्साहन देना भी एक प्रकार का राजनितिक सोसन ही तो है। हमे याद रखने होंगे आज जितने भी उन्नत तकनीक का बिकास हुए ओ किसी एक समाज या एक देश ने नहीं किये है । इसलिए हमें संकीर्ण मानसिकता को त्यागने होंगे।
जय जोहार!

आदिवासी हिन्दु नहीं है~
हिन्दु विवाह अधिनियम १९५५~अनु० २.२

Aapne sahi kaha ..hum sabko mil kar es disha me aaagge kadam badhana hai..jai aadiwasi..

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श्री मुर्मू भाई ! आपके लेख़ के लिए धन्यवाद I आपने बिल्कुल उचित कहा है I परन्तु यह भी सही है कि हम आदिवासियों को बचाने कोई नहीं आएगा I कोई राजनैतिक पार्टी नहीं , झारखण्ड नामधारी राजनैतिक पार्टी तो बिल्कुल नहीं I ये , वो युग भी नहीं कि अर्जी करते ही भगवान प्रकट हो जाते I एक दिन इसी विषय पर मैंने एक धर्मभीरु आदिवासी बुजुर्ग से , मेरी चिंता के प्रत्युत्तर में यह सुना कि भगवान सब देख रहे हैं I मैंने नाराज़ होकर तत्काल उन्हें यह जवाब दिया " ऐसा सिर्फ डरपोक , कुछ करना नहीं चाहने वाले ही सोचते और कहते हैं I सैकड़ों सालों से बल्कि हज़ारों सालों से झारखण्ड एवं दुनिया के तमाम आदिवासियों के साथ जो अत्याचार , शोषण एवं नरसंहार होते आया है क्या उन्हें भगवान ने देखा जो अब देखेंगे ?" ख़ैर ! ये तो मेरी और उस बुजुर्ग के बीच की कहा - सुनी थी I स्वयं एवं हमारी आनेवाली पीढ़ियों को बचाने के लिए हम - आप युवा भाई - बहनों ही नहीं समस्त आदिवासियों को को ही आगे आना पड़ेगा I वो भी शीघ्र अति शीघ्र I क्योंकि , पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र के हम आदिवासी अपने अस्तित्व काल के शायद अंतिम चरण में हैं I छठी अनुसूची क्षेत्र के आदिवासियों के अस्तित्व की समाप्ति का डर शीघ्र नहीं है I
वैसे तो, भारतीय संविधान का केयरटेकर (नाममात्र का देखभाल करने वाला) भारत देश का राष्ट्रपति एवं संरक्षक भारत का सर्वोच्च न्यायालय है I संविधान की पाँचवीं तथा छठी अनुसूची के अतिरिक्त भारतीय आदिवासियों को संविधान प्रदत दूसरे हितों के पालन - अनुपालन का संज्ञान सुप्रीम कोर्ट एवं राष्ट्रपति को वर्षों पहले ही ले लेना चाहिए था I परन्तु , बहुत ही दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि ऐसा नहीं हुआ I पाँचवीं अनुसूची के अनुपालन का मुख्य उत्तरदायित्व सम्बंधित राज्यपाल का होता है I किन्तु , भारत का इतिहास देखने के बाद लगता है कि अनुसूचित क्षेत्रों के राज्यपालों ने शायद जान - बूझकर या किसी अन्य दबाव में अपनी जिम्मेवारियों व कर्तव्यों का पालन संविधान सम्मत नहीं किया है I संविधान का पालन नहीं करना क्या संविधान का उल्लंघन नहीं है ? संविधान का उल्लंघन क्या देशद्रोह की संज्ञा नहीं है ? और देशद्रोह की सजा शायद आपको पता ही होगा I मुझे लगता है कि संविधान की पाँचवीं तथा छठी अनुसूची के अतिरिक्त भारतीय आदिवासियों को संविधान प्रदत दूसरे हितों के पालन - अनुपालन के लिए हमें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए I क्या कोई साथ है ? विजय मुण्डा

I am with you

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I'll reply soon.

jee haan , mai aapke sath hu..aur ek din aisa bhi aayega ke pura aadivasi samaj hamare sath honge..hum sabko milkar sabhi aadivasko jagruk karna hoga..

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Ye,hamare aadivasi samaj ki chingariya he Jo aadivasio me ujala felane kam kar rahi he ,ham sab aadivasi aadivasi samaj (all Bharat)milkar Sanvithan adhikar lekar rahenge tab aadivasio me ujala hoga-jai aadivasi.Manilal gamit, tapi vyara, Gujrat, jai birsa ......

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We all Adivasis, from time to time, have been protesting /fighting against all forms of exploitation currently being exercised or likely to be exercised by the Central/State Governments in Scheduled Areas but, in different ways and forms under different banners in different States. People's strong protest in streets and roads as dharna, sammelan or mahasammelan may be, of course, an immediate “first - aid” relief to the affected people from any exploiting plan of the government(s) as the government(s) is sometime forced to defer its plans/programmes keeping in view of such protests. But, such protests/bandhs/dharnas/sammelans can no longer defuse the ill-will of non-adivasi governments whom we may even call alien or foreign governments. The defused plans of the existing government(s) will be taken up later by the same government or successive alien government(s). Since the Independence of India the Governments have been formulating plans or programmes that will gradually lead to the extinction of Indian Adivasis. Examples are there almost in all scheduled areas in the country, in the forms of power projects, steel plants, mines and mineral productions, etc. A large number of Adivasis have been displaced without compensation and been forced to live a life of beggars and labourers despite the constitutional safeguards to them. Job opportunities to the affected adivasis are promised before grabbing their lands but they are either declared as “not eligible” or otherwise. Compensation and jobs by tampering official records or by fake identity and certificates, are showered as booms to non- adivasis as in the case of Bokaro Steel Plant and HEC, Ranchi to name a few. Common poor, illiterate and ignorant adivasis are forced to sustain their lives and livelihoods by Old Age Pension, Widow Pension, MGNAREGA and “35 kgs rice for 35 rupees” scheme and that too under extreme corruption. I would, therefore, like to propose for a permanent solution, i.e; to form a national political party which will work across the scheduled areas. "We scheduled tribes" of all such States can unitedly protest against all sorts of exploitation unitedly, strongly and simultaneously under a single banner. This will make us strong and our joint voices will definitely compel the governments to hear us. We can also contest elections under the single national party in different States till the implementation of Vth schedule in all the schedule areas in the country. Unless and until we possess a political power the non-adivasi governments will never-ever stop to exploit and crush down the Adivasis till its extinction. VIJAY MUNDA

ADIWASI MAHASABHA FIFTH SCHEDULE K RULES KO LAGU KARANE KI PURI KOSISH ME KAM KER RAHA
HAI ..... YOU TUBE ME VIJAY KUJUR KO SONIYE.... 9 AUGUST KO WORLD TRIBLE DAY JAROOR MANAYEN..... JAI ADIWASI.

सैकड़ों सालों से बल्कि हज़ारों सालों से झारखण्ड एवं दुनिया के तमाम आदिवासियों के साथ जो अत्याचार , शोषण एवं नरसंहार होते आया है क्या उन्हें भगवान ने देखा जो अब देखेंगे ?"

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Jai johar

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Jai johar

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बुहत धन्यवाद सर जी इतना सवैधानिक जानकारी देने के खास कर पांचवी अनुसूची का हमारे मध्यप्रदेश
के मूलनिवासियों को इतना जानकारी नहीं है

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shankarmarko75@gmail com.

Ham sbhi KO mil kar away uthana hoga...

Or hamre adivashiyo ko jagana hoga

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5 schedule article 244(1) gives us many rights like gram sabha (13)3 a to take all decision for the development of village and it's needed.

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Ranglalmeena763

संविधान की जानकारी बहुत सरल तरीके से आपने समझाया है इससे मध्य प्रदेश एवं अन्य राज्यों के आदिवासियों को जानकारी उपलब्ध होगी और वह अपने हक और अधिकार के लिए जागरुक होंगे धन्यवाद

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हम युवाओं को आगे आकर लागू करवाना करवाना चाहिये !

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आदिवासी समाज के आधार पर आदिवासी समाज में बौद्धिक क्रांति की आवश्कता हैं।

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समाज में जागरूकता पैदा करना ही आदीवासी धर्म

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Kunwar Sunil17@gmail.com

Hame ek hone ki awashyakta hai.

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7354963821
7999371966
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shrishradhabhakti4@gmail.com

5वी अनुच्छेद 244(1) के प्रशासन और नियंत्रण के बारे में बहुत ही अच्छे से जिक्र किया है। मुझे अच्छी जानकारी मिली साथ ही और भी हमारे बहुत से आदिवासी भाइयों को मिली होगी। मैं भी चाहता हूँ कि इस तरह के लेख से हम सभी आदिवासियों को नीद से जगाने और जागरूक करने के लिए लिखते रहिये और ज्यादे से ज्यादे पोस्ट भी करिये ताकि ज्यादे से ज्यादे लोग जुट सकें।

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kujurlouis34@gmail.com

Panchvi anusuchi ko lagu nahi karne wali shasan parshan ke khilaf wa rajy sarkar ke kilaf sakt kanuni karywahi ho.

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sukhranjan.usendi1115@gmail.com

Panchvi anusuchi ko lagu nahi karne wali shasan parshan ke khilaf wa rajy sarkar ke kilaf sakt kanuni karywahi ho.

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हमारे आदिवासी परिवार को बिखेर दिया था पर उसके बाद हमारे युवा पडे लिखे लोगो ने उस संविधान को पडा और जाना तो बताया गया कि हमारे उपर कितना शोशण हुआ हे हमे कभी भी आगे नही आने दिया हम गुलाम नही हमारी मानशिक्ता को गुलाम बना दिया लेकीन जब हमे पता चला की हम किन किन योध्दाऔ के वंशज हे हमारे राणा पुजा जेसा योध्दा हमारे टांट्या भील और बीरसा मुडा अब हमे हमारे अधिकार लेना चाहीय जय जोहार जय आदिवासी जय राणा पुंजा

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आप संविधान एवं ५वी अनुच्छेद के जानकारी दिए है ।नवयुवक लोगो को जागरूक करना ही आदिवासी का धर्म है।

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आजादी के७०वरष बाद भी हमारा समाज ईतना पिछड़ा क्यों है।मुझे लगता है।मुख्य कारण मानसिक गुलामी है।हम लोगो को मानसिक रुप से गुलाम बना दिए है।हमारा दिमाग नही सोच पा रहा ।और इसका मुख्य कारण धर्म है।जब जब हम लोग सोचने का प्रयास करते है।हम धर्म के बंधन से मुक्त नही हो पाते है।और हम वही के वही रह जाते है।जब तक हम वैज्ञानिकता को नही अपनाएगे तब तक गुलामी से मुक्त नही हो सकते क्योंकि जो आर्य लोग धर्म का रचना किए है।वह मूल निवासिओ को गुलाम बनाए रखने के लिए है।विकास के लिए नही है।जय सेवा ।

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इस बारे मे सभी काे समझना हाेगा

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भारतीय संविधान के अनुसार 19 ए भारत मे कोई भी नागरिक किसी भी गाँव किसी भी शहर मे घूम फ़िर सकता हे ।.....लेकिन 19( 5)किया कहता हे ।अनुसूचित क्षेत्रों मे बिना ग्राम सभा कि अनुमति के वो इन क्षेत्रों मे न घूम सकता हे और न ही व्यापार कर सकता हे और नही कोई ज़मीन खरीद सकता हे । आजादी के 72 साल बाद भी इन क्षेत्रों मे गेर आदिवासीयौ ने व्यापार ,ज़मीन ,एवम उनको मानसिक गुलाम बनाया हे ।..जो आदिवासी इस देश का मालिक था आज उसको ..मजदूर बना दिया हे ।..एवम लगातार आदिवासी जल जंगल एवम ज़मीन को बचाने ..के संघर्ष करते आया हे ।...लेकिन आदिवासी विधायक ,सांसदों कि लापरवाही के कारण आदिवासी समाज लगातार पिछड़ते जा रहा हे ।

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Me sahmat hu

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<p>सभी जानते हैं कि झारखंड का हर वो क्षेत्र जो खनीज संपदा से परिपूर्ण है, वहां-वहां आदिवासियों का ही निवास है, ऐसे में सरकार अगर इन क्षेत्रों को पांचवीं अनुसूची क्षेत्र घोषित कर, पेशा कानून लागू कर दे, ग्राम सभा को उसका पुरा अधिकार दे दे, तो जमीन की लूट कैसे हो पायेगी....असल कारण ये है, जिसके कारण आदिवासियों को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित रखा गया है.......ऐसे में अब राज्यपाल, &nbsp;सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति ही एकमात्र सहारा दिखते हैं.....इन तक पहुंच कर ही अपना संवैधानिक अधिकार लिया जा सकता है।&nbsp;</p>

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आदिवासी समाज को एक होना हैं

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Raju Murmu's picture

मेरे इस आर्टिकल को पढ़ने और सहरहना करने के लिए दिल से  धन्यवाद देता हूँ । आप सभीके प्यार और  सराहना ही मुझे कुछ नया लिखने की प्रेरणा देता है और मैं इस बात से खुश हु की मेरे इस एक छोटे से प्रयास ने मुझे एक नई दिशा और उद्देश्य दिया है। इस कारन आज मैं अपने ६०० से भी ज्यादा  'आदिवासी समुदायों ' को आर्थिक सामाजिक विकास के शिखर पर देखना चाहता हूँ और प्रयासरत हु। भारत के लाखो आदिवासी युवाओ से जुड़ा हुआ हूँ और आज (जयस- जय आदिवासी युवा शक्ति )  किसी के पहचान का मोहताज नहीं है। लगभग दस राज्यों में आदिवासियों के संविधानिक अधिकार 'पांचवी अनुसूची 'को पूर्ण रूप से भारत के दस अनुसूचित राज्यों में लागु कराने एवं आदिवासी सखाजनो तक संविधान के इस प्रारूप अनुसूची पांच को पुरे भारत में  जागरूकता  लाने के लिए जयस के झंडे के तले प्रयासरत है और आप सभी बड़े बुजुर्गो के आशीर्वाद से और हम आदिवासी युवाओ के प्रयास से हम  इस  सामाजिक जागरूकता को फैला कर रहेंगे।

जोहार

राजू मुर्मू

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