बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथ को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।" ~~~~~~~~~~~~~~~~ खजूर के पेड़ के भाँति बड़े होने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि इससे न तो यात्रियों को छाया मिलती है, न इसके फल आसानी से तोड़े जा सकते हैं | आर्थात बड़प्पन के प्रदर्शन मात्र से वह बड़ा नहीं हो जाता। कबीर जी के हर दोहे में गुढार्थ और चिंतन छिपे रहते हैं। जिसको जिस तरह से समझना होता हैं वह उसी तरह से समझकर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करता हैं। देखा जाए तो इस दोहे में भी बड़े व्यक्ति के लिए खजूर के पेड़ को आधार मानकर जो बात कही गई हैं उसी तरह मैंने भी अपने आदिवासी समाज के बड़े साधन सम्पन्न व्यक्तियों को संबोधित किया हैं। बड़े और साधन सम्पन्न का यहाँ मेरा आशय सिर्फ शिक्षित व्यक्तियों से हैं। जी हाँ,  आदिवासी समाज में शिक्षित वर्ग वह हैं जो पढ़ाई करने वाला, नौकरी पेशा और राजनीति में चाहे वह विधायक हो, वह चाहे सांसद हो या फिर गाँव का सरपंच ही क्यों न हो। मैं इस लेख में उपरोक्त सभी व्यक्तियों को शिक्षित के समतुल्य समाज के बड़े व्यक्ति के रूप में मान रहा हूँ। मानना मेरी विवशता नहीं हैं बल्कि जब समाज का व्यक्ति बड़े पद को प्राप्त कर लेता हैं तो वह समाज के अग्रिम पंक्ति का व्यक्ति स्वतः ही बन जाता हैं। बड़े होने भर से सम्मान का अधिकारी नहीं हो जाता बल्कि जिम्मेदारी और कर्तव्य-पालन भी बढ़ जाते हैं। कोई व्यक्ति इसका पालन बखूबी करता हैं तो कोई पल्ला झाड लेता हैं, हाँ यह बात अलग हैं कि वह या तो किसी अन्य जिम्मेदारी की वजह से अपने समाज की और ध्यान नहीं देता हैं। या फिर जानबूझकर किनारा कर लेता हैं। अभी हाल ही में रविवार 05 जून को आयोजित "आदिवासी समाज के अधिकारी कर्मचारियों जो उज्जैन में पदस्थ हुए हैं, को सम्मानित करने एवं सभी साथियों का एक दूसरे से परिचय के उद्देश्य से हुई बैठक " में अधिकारी लेवल से लगाकर विद्यार्थी तक आदिवासी समाज का व्यक्ति उपस्थित हुआ। इतना ही नहीं आदिवासी समाज का कोई भी आयोजन प्रयोजन वह चाहे किसी भी दूरस्थ क्षेत्र में होता हैं तो उसमें भी इन्हीं वर्गों की उपस्थिति अधिक रहती हैं, इससे यह नहीं कहा जा सकता की नौकरी पेशा और विद्यार्थी वर्ग अपने आदिवासी समाज के प्रति गंभीर नहीं हैं। हाँ समाज के राजनीति में प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों के संबंध में संशय जरूर हो सकता हैं कि वे अपने समाज के प्रति जवाबदेही हैं अथवा नहीं। जैसाकि शीर्षक में उल्लेखित हैं,  को आदिवासी समाज के बड़े पदों पर आसीन व्यक्ति यदि समाज के प्रति गंभीर नहीं हैं तो यह बात बिलकुल सही बैठती और आगे विश्लेषण करने की आवश्यकता भी नहीं रह जाती। बात समाज के बड़े व्यक्ति की हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो बड़े पद को तो प्राप्त कर ही लिया हैं साथ ही साथ उनके अतिरिक्त आदिवासी समाज का और व्यक्ति तत्समय मौजूद नहीं होने से भी वह बड़े होने का दंभ भरता हैं यहाँ तक की उसे "आदिवासी" कहलाने पर एक शर्मिन्दगी महसूस करता हैं, ऐसे में उसका बड़पन्न केवल प्रदर्शन मात्र ही हैं। आजकल आदिवासी समाज के हर ग्रुप में उठती हैं कि हम फलाँ नहीं हैं ढिकणा नहीं हैं। हम आदिवासी हैं, तो ठीक हैं पर क्या हम ग्रुप में केवल वाद-विवाद या तर्क-वितर्क के लिए शामिल हुए हैं हमारा आदिवासी-समाज के प्रति कोई दायित्व नहीं रह गया हैं जो इधर उधर की बातों में उलझकर हम अपना कीमती समय यूँ ही गँवा दे। बल्कि मैं तो कहूँगा की ग्रुप में बहस में पड़ने के बजाए मौन अच्छा हैं। और भला मौन भी क्यों रहे कम से कम आदिवासी समाज में होने वाली गतिविधियों को ही एक दूसरे को शेयर कर लें। नहीं तो दूसरे साथी तो यही कहेंगे की "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं,  फल लागे अति दूर।। "

प्रस्तुति:- मोहनलाल डॉवर

जयस विकास परिषद् बदनावर जिला धार (मध्यप्रदेश)

Comments

बहुत शानदार पोस्ट है भाई साहब आपको पोस्ट को शेयर कर रहा हु पढ़ कर बहुत अच्छा और बहुत ही सटीक रूप से बात निरन्तर रखे एक ना एक दिन मेरा अपना समाज जरूर ऊँचाई को छुएगा

Tadavi bhill samajme gehr muslim lok kete he ki hmbhi Tadavi bhill he he lok maharashtra tadavi bhill he samaj rahetahe Dist jalgaon, abad 2dist ka me rahetehe

MOBILE NO: 
9665942717
9665942717
e-Mail: 
rajutadavirss@gamil. com

Aadivasi me yadav bill samaj he hor jaane ek dhrm he muslim ho tadavi bhill manta apne aapko maharasthra me he sab bogas karbar karte he

MOBILE NO: 
9665942717
e-Mail: 
rajutadavirss@gamil. com

अपने विचार यहां पर लिखें

Order
अपना मोबाईल नम्‍बर लिखे
Image CAPTCHA