मानगढ़ आदिवासी शहादत को श्रध्दांजली

राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश की लोक संस्कृतियों का त्रिवेणी संगम वागड लोक परम्पराओं, सांस्कृतिक रसों और जन-जीवन के इन्द्रधनुषी रंगों से भरा-पूरा वह अँचल है जहाँ लोक जागरण, समाज सुधार और स्वातंत्र्य चेतना की त्रिवेणी प्रवाहित होती रही है। आर्थिक,सामाजिक व शैक्षिक दृष्टि से भले ही इस जनजाति बहुल दक्षिणाँचल को पिछडा माना जाता रहा हो मगर आत्म स्वाभिमान की दृष्टि से यह क्षेत्र कभी उन्नीस नहीं रहा । आत्म गौरव की रक्षा के निमित्त प्राणोत्सर्ग करने का जज्बा इस क्षेत्र की माटी में हमेशा से रहा है । इसी का ज्वलन्त उदाहरण है- मानगढ धाम ।

राजस्थान और गुजरात की सरहदी पर्वतीय उपत्यकाओं में बाँसवाडा जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर अवस्थित मानगढ धाम सामाजिक जागृति और स्वातंत्र्य चेतना के लिए लोक क्रांति का बिगुल बजाने वाला महाधाम रहा है जहाँ का जर्रा-जर्रा क्रांति चेता व्यक्तित्व गोविन्द गुरु का पैगाम गुंजा रहा है । 20 वीं सदी के आरंभिक दौर में लोक श्रद्धा के महानायक गोविन्द गुरु के नेतृत्व में आयोजित संप सभा में जमा हजारों श्रद्धालु आदिवासियों पर रियासती व अंग्रेजी फौजों ने तोप, बन्दूकों और मशीनगनों ने इस तरह कहर बरपाया कि देखते ही देखते 1500 से ज्यादा आदिवासी काल के गाल में समा कर शहीद हो गए। जलियांवाला बाग से भी ज्यादा बर्बर इस नर संहार की दिल दहला देने वाली घटना का साक्षी मानगढ धाम भले ही इतिहास में अपेक्षित स्थान प्राप्त नहीं कर पाया हो मगर राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के इस सरहदी दक्षिणांचल के लाखों लोगों के हृदय पटल पर यह श्रद्धा तीर्थ आज भी अमिट रहकर पीढयों से लोक क्रांति के प्रणेता गोविन्द गुरु के प्रति आदर और अगाध आस्था बनाए हुए है। 20 दिसम्बर 1858 को डूँगरपुर जिले के बांसिया(बेडसा) गांव में बंजारा परिवार में जन्मे गोविन्द गुरु ने पढाई-लिखाई के साथ ही सात्विक- आध्यात्मिक विचारों को आत्मसात किया । स्वामी दयानन्द सरस्वती व अन्य संत महापुरुषों के सानिध्य में रहने का यह प्रभाव हुआ कि उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लोक जागरण और सेवा के लिए समर्पित कर दिया । सामाजिक कुरीतियों, दमन व शोषण से जूझ रहे समाज को उबारने के लिए राजस्थान, गुजरात व मध्यप्रदेश के सरहदी दक्षिणाँचल वागड को कर्म स्थल बनाया और लोकचेतना का शंख फूंका । इसके लिए उन्होंने 1903 में ’ संप सभा ’ नामक संगठन बनाया । मेल-मिलाप का अर्थ ध्वनित करने वाला यह संगठन सामाजिक सौहार्द स्थापित करने, कुरीतियों के परित्याग, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार करने तथा शिक्षा,सादगी,सदाचार व सरल-सहज जीवन अपनाने की प्रेरणा आदिवासी समाज में भरने लगा । इस संगठन ने आपसी विवादों का निपटारा पंचायत स्तर पर ही करने में विश्वास रखा तथा समाज सुधार की गतिविधियों को बल दिया। परिणामस्वरूप उनके अनुयायियों की तादाद लाखों में पहुँच गई । मानगढ धाम इन गतिविधियों का केन्द्र बना। सन् 1913 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा(कहीं-कहीं सन् 1908 का भी उल्लेख मिलता है ) के दिन इसी मानगढ पहाडी पर 3 से 5 लाख आदिवासी भगतों का मेला जमा था जहाँ ये सामाजिक सुधार गतिविधियों और धार्मिक अनुष्ठानों में व्यस्त थे । चारों तरफ श्रद्धा और आस्था का ज्वार हिलोरें ले रहा था। रियासती और अंग्रेजी फौज इस समाज सुधार और आजादी पाने के लिए चलाए जा रहे आन्दोलन को कुचलने के लिए लगातार दमन भरे प्रयासों में जुटे हुए थे। इतनी बडी संख्या में आदिवासियों का जमावडा देख पहले तो तितर-बितर करने की कोशिश की मगर गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और अपने मकसद को पाने के लिए पूरे जज्बे के साथ जुटे इन दीवानों पर इसका कोई असर नहीं पडा। इसी बीच अंग्रेजी फौज के नायक कर्नल शटन के आदेश पर रियासती व अंग्रेजी फौज ने पूरी मानगढ पहाडी को घेर लिया और फायरिंग के आदेश दे दिए। तोप, मशीनगन और बन्दूकें गरजनें लगी और देखते ही देखते आदिवासी भक्तों की लाशें बिछ गई । जिस बर्बरता और क्रूरता के साथ अंग्रेजी फौज ने यह सब कुछ किया उसके आगे जलियांवाला बाग काण्ड की भीषणता भी फीकी पड गई । गोरे लोगों द्वारा ढाए गए जुल्म के इतिहास में मानगढ नरसंहार काले पन्ने की तरह है । इस भीषण नरसंहार में शहीद होने वाले भगतों की संख्या 1500 बताई गई है । गोविन्द गुरु भी पाँव में गोली लगने से घायल हो गए। यहीं उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और अमदाबाद तथा संतरामपुर की जेल में रखा गया। जनसमूह को इकट्ठा करने, आगजनी तथा हत्या का आरोप मढते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनायी गई। बाद में इस सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया । फिर सजा को कम करते हुए 12 जुलाई 1923 को उन्हें संतरामपुर जेल से इस शर्त पर रिहा किया गया कि वे कुशलगढ, बाँसवाडा,डूँगरपुर तथा संतरामपुर रियासत में प्रवेश नहीं करेंगे ।

गोविन्द गुरु सन 1923 से 1931 तक भील सेवा सदनझालोद के माध्यम से लोक जागरण, भगत दीक्षा व आध्यात्मिक विचार क्रांति का कार्य करते रहे । 30 अक्टूम्बर 1931 को लाखों भक्तों को अलविदा कह यह महान शख्सयत महाप्रयाण कर गई । गोविन्द गुरु यद्यपि आज हमारे बीच नहीं है मगर उनके उपदेश आज भी लाखों भक्तों के माध्यम से समाज में नई ऊर्जा और प्रेरणा संचरित कर रहे हैं।

SPECIAL THANKS

JITENDRA PARMAR

FACEBOOK WALL से

Comments

Aasdivasi yuva shaki

MOBILE NO: 
9001395228
e-Mail: 
jitendrakmeena10@gmail.com

Add new comment

Order
अपना मोबाईल नम्‍बर लिखे
Image CAPTCHA