लेख

गोंडवाना सेना ने अंग्रेजो से युध्द किया था । भारत के आजादी की लडाई मे अंग्रेजो को मुहतोड जबाब दिया था ।

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AADIVASI

विकास से विस्थापन आदिवासियों का पलायन और विस्थापन सदियों से होता रहा है और ये आज भी जारी है। आदिवासियों के जंगलों, जमीनों, गाँवों, संसाधनों पर कब्जा कर उन्हें दर-दर भटकने के लिए मजबूर करने के पीछे मुख्य कारण हमारी सरकारी व्यवस्था रही है। वे केवल अपने जंगलों, संसाधनों या गाँवों से ही बेदखल नहीं हुए बल्कि मूल्यों, नैतिक अवधारणाओं, जीवन-शैलियों, भाषाओं एवं संस्कृति से भी वे बेदखल कर दिए गए हैं। हमारे मौलिक सिद्धान्तों के अन्तर्गत सभी को विकास का समान अधिकार है। लेकिन आजादी के बाद के पहले पाँच वर

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इस पृथ्वी के जल आकाश और भूमि के सभी प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो सबसे विकसित और संगठित सामाजिक समूह में रहने वाला और नए चीजो को सृजन करने की क्षमता रखता है। ज्ञान बुद्धि , समझ , भावना , प्रेम , क्रोध , घृणा , द्वेष जैसे मानवीय विशेषताओं से भरा हुआ मनुष्य 'प्राणी जगत' में मनुष्य द्वारा सृजन करने की अदभुत क्षमता के कारण ही मनुष्य को इस पृथ्वी में अनूठा प्राणी बनाता है।

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Jaypal Singh Munda

जयपाल सिंह मुंडा झारखंड आंदोलन के एक प्रमुख नेता थे। जयपाल एक जाने माने हॉकी खिलाडी भी थे । उनकी कप्तानी में भारत ने १९२८ के ओलिंपिक में भारत

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2 जनवरी 2006 को हमारे 'हो' समाज के 12 लोग औधोगिक आतंकवाद का शिकार बने। पुराने जमाने में किसी बड़े काम के पहले इंसानों की बलि दी जाती थी,यह परंपरा बदस्तुर अभी भी जारी है।इस बार 1 या 2 नहीं पुरे 12 'हो' लोगों की बलि दी गई। ओड़िसा के जाजपुर जिला की सुकिंदा घाटी प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है,खनिज संपदा प्रचुर मात्रा में है।जाजपुर में अन्य भागों की तरह बाढ नही आता है।यहां आसपास हमारे 'हो' निवास करते हैं,जो स्वभाव से अत्यंत ही सरल हैं।उनके पास विरासत में हाथी,शेर और भाल

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" सेरेंगसिया घाटी पश्चिमी सिंहभुम के कोल्हान क्षेत्र के टोन्टों प्रखंड के अंतर्गत आता है जो चाईबासा से 30 km दक्षिण दिशा में है। सेरेंगसिया घाटी में आदिवासी हो लोगों का युद्ध आंदोलन का ही एक हिस्सा था,जिसको भारत के इतिहासकारों ने अपने किताबों में जगह नहीं दी। हम आदिवासी अपने हक के लिये लड़े तो हमें विद्रोही करार दिया गया। हो लड़ाकों की वीर भुमि में राजाबासा के पोटो सरदार,बलंडिया के बेराई डेबाय,नारा हो,टोपाये,इचाकुटी के जोटो,पाटा डुमरिया के पांडवा जोंको,सर्बिल के कोच

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तीर- धनुष आदिवासी समाज का हथियार नहीं बल्कि उस समाज का धार्मिक, सांस्कृतिक एंव सामाजिक पहचान हैं!!

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नए साल की पहली तारीख को जब लोग खुशियां मनाते हैं, तब खरसावां के आदिवासी अपनों की कुर्बानी के लिए आंसू बहाता है। आज भी यहां के आदिवासी क्षेत्र के लोग 1 जनवरी 1948 की घटना को याद कर सिहर उठते हैं, जब यहाँ के लोग अलग 'आदिवासी राज्य ' की मांग कर रहे सैकड़ों आदिवासियों पर प्रशासन द्वारा की अंधाधुंध फायरिंग का शिकार हुए थे।

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रानी दुर्गावती (5 अक्टूबर, 1524 – 24 जून, 1564)) भारत की एक वीरांगना थीं जिन्होने अपने विवाह के चार वर्ष बाद अपने पति दलपत शाह की असमय मृत्यु के बाद अपने पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बैठाकर उसके संरक्षक के रूप में स्वयं शासन करना प्रारंभ किया। इनके शासन में राज्य की बहुत उन्नति हुई। दुर्गावती को तीर तथा बंदूक चलाने का अच्छा अभ्यास था। चीते के शिकार में इनकी विशेष रुचि थी। उनके राज्य का नाम गढ़मंडला था जिसका केन्द्र जबलपुर था। वे इलाहाबाद के मुगल शासक आसफ खान से लोहा लेने के लिये प्रसिद्ध हैं

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