लेख

यह बात सत्य है कि एक व्यक्ति अपने देश ,अपने राज्य और अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि करता है। एक व्यक्ति अपने आप मे एक अच्छा गाइड होता है , परंतु यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपने आप को किस तरह से प्रस्तुत करता है। बात दिसंबर 2015 की है। मैं अपने परिवार सहित दिल्ली से झारखण्ड रेल से सफर कर रहा था। हमारी रेल अपने समय से छः से सात घंटे देर से चल रही थी। जम्मूतवी एक्सप्रेस जो राउरकेला तक जाती है दिल्ली से होकर उत्तर प्रदेश और फिर हटिया झारखण्ड पहुँचती है। बड़े मजे से सफर का आनंद उठाते हुये हम लोग जा रहे थे। हमारे कोच मे कई तरह के लोग थे बड़े मजे कि बात यह होती है... more

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सत्ता के नशे में चूर न जाने कितने बादशाह , तानाशाह इतिहास में दफ़न हो गए। फिर भी शासक और शोषण के क्रूर सिद्धांत को हम इंसान आजतक समझ नहीं पाये हैं। पूरे विश्व का इतिहास पढ़ लें हरेक शासक वर्गों ने सिर्फ जुल्मों सितम के अलावा कुछ नहीं किया। उन शहंशाहों , महाराजों ,जागीदारों , सामंतों,पुरोहितों ने कभी भी अपने आवाम के लोगों के सुख दुःख की बाते नहीं की थी। अत्याचार, लगान, और अत्यधिक परिश्र्म करा कर इन्होंने अपने बड़े-बड़े शानदार खूबसूरत महल, मीनारऔर अपने अय्यासी के अड्डे बनाये। बेबीलोन से लेकर मिश्र,चीन से लेकर भारत इन देशो की प्राचीन इतिहास में इन तानाशाहों के जलवो... more
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अनुसूचित क्षेत्र के ‘आदिवासी समाज’ शिक्षित होने के बाद भी अपने अधिकारों के प्रति अनिभिज्ञ है !

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एक दिन मैने किसी न्यूज़ चेंनल मे किसी राजनीतिक पार्टी के एक प्रवक्ता को 'राष्ट्र' और ' राष्ट्रवाद ' की परिभाषा देते हुये कहते सुना की जो व्यक्ति देश की आस्था और संस्कृति के संवेदनाओं से प्रेरित होता है वही सच्चा "राष्ट्रवादी" होता है । मुझे यह विचार सुनने मे तो अच्छे लगे लेकिन कूछ प्रश्न मेरे मन उठ रहे थे । भारत जैसी विशाल और विविधता से भरा देश में "राष्ट्रवाद" की परिभाषा कोई एक समूह सुनिश्चित नही कर सकता । किसी के चिल्लाने भर से कोई राष्ट्रभक्त नहीं बन जाता।  क्या भारत के सभी लोग अपने संस्कृति और परम्पराओं से प्यार नहीं करते ?

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मैंने अपने अपने माता पिता से सुना था की जब वे लोग छोटे थे वे लोग अलग  'झारखण्ड  राज्य' आंदोलन में  झंडा लेकर सड़को में निकले थे और नारा लगाए थे " लड़ के लेबो झारखण्ड" और " अबुआ दिशोम ,अबुआ राज"। सन 1947 से 'झारखण्ड आंदोलन' में शामिल कई लोग नए 'आदिवासी राज्य'  के लिए सीने में गोली खाये और कुछ तो अलग  'झारखण्ड  राज्य' की आशा करते करते हुए दफ़न हो गए, मिटटी में मिल गए। लेकिन अपने जीवित रहते नहीं देख पाए।

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सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के मुद्दे पर झामुमो विधायक ‘दीपक बिरुवा’ व मनोहरपुर विधायक ‘जोबा मांझी’ ने 21 नवम्बर 2016 को  टीएसी सदस्य से राज्यपाल को पत्र प्रेषित कर इस्तीफा दे दिया था।  विधायक दीपक बिरुवा ने बताया कि वह  'जनजाति सलाहकार परिषद' का सदस्य है।  सरकार द्वारा सीएनटी-एसपीटी एक्ट की मूल भावना से विरुद्ध जबरन असंवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर संशोधन का प्रस्ताव सभा में लाया गया । विधायक 'दीपक बिरुवा' व 'जोबा मांझी' इस कार्य से काफी आहत होते हुए अपने सदस्यता  से इस्तीफा दे दिया था ।

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तब मैं पाँचवी या छठवीं कक्षा मे पढ़ने वाला छोटा सा बालक ही था । बालकपन वाला अल्हड़ उम्र खेलना कूदना और मस्ती का उम्र होता है और बच्चो के कच्चे मन मे जिज्ञासा और प्रश्न खूब उठते रहते है । बचपन की कुछ यादे शेयर कर रहा हूँ। मेरे पिता ' मिलिट्री ' में थे। हम लोग अपने छोटे से परिवार के साथ शहर में रहते थे। लेकिन गर्मियों मे जब स्कूलों की छुट्टियाँ होती थी तब मेरे पिताजी हमे गाँव ले जाया करते थे ।पूरी गर्मियों की छुट्टियों मे गाँव मे खूब मस्ती करते थे । हरे भरे खेत खलिहान देख कर मन खुश हो जाता था ।

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20 हज़ार आदिवासियों की कुर्बानी से शुरू हुई थी स्वतंत्रता की कहानी, जब 1855 में जगे थे हिन्दुस्तानी

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निर्माताओं को उन महानायकों पर भी फिल्म बनाने के बारे में सोचना चाहिए जो देश के लिए मर मिटे, लेकिन उन्हें भारत के इतिहास में सही जगह नहीं मिली या यूं कहें कि भारत सरकार ने उन्हें भूला दिया.आदिवासियों के कई महानायक हैं जो देश के लिए एक मिसाल कायम कर गए...

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