लेख

1947 में जब भारत ब्रिटिश शासको के अधीनता से आजाद हुआ तब भारत में कई देसी रियासते थी । भारत कई छोटे – छोटे प्रांतो में बटा हुआ था। तब भारत के महान राजनितिक लीडरो को यह चिंता सताने लगी की इतने बड़े भू- भाग के ‘देसी रियासतों’ को कैसे नियंत्रित किया जाए। इसी सोच ने भारत के सभी प्रान्तों को पुनर्गठित करने की मुहीम ‘सरदार बल्लभ भाई पटेल’ के नेतृत्व में शुरू किया गया। आजादी के बाद भारत में... more

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*तिलका मान्झी एक आदिवासी योद्धा*
*Tilka Manjhi Was The First Indian Freedom Fighter*

*1857 की क्रांति से 100 साल पहले ही अंग्रेज़ों के खिलाफ इस सेनानी ने उठा लिए थे हथियार*

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बड़ी-बड़ी निराशाओं के बीच, आज भी संघर्षशील आदिवासी समाज मनुष्य और मनुष्यता के बीच के बुनियादी रिश्तों और उसके मूल्य को अपनी पारम्परिक स्वशासन व्यवस्था के परिवर्द्धित स्वरूप में कायम करने में लगा हुआ है ताकि आधुनिक विकास के दौर में भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत हो सके, साथ ही, वैश्वीकरण, बाजारवाद और उपभोक्तावाद के खिलाफ भारतीय समाज तन कर, पूरी मजबूती के साथ खड़ा हो सके। 'आदिवासी' का तात्पर्य क्या है? महज एक अवधारणा कि इससे आगे भी कुछ…? इसकी बुनियादी अवधारणा क्या है? आधुनिक अवधारणा क्या है?

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झारखंड फिर से सुलग रहा है, जमीन के अंदर कोयले में लगी आग की तरह जो बीच-बीच में धधक-धधक कर बाहर निकल आती है। यह आग पिछले तीन सौ सालों से लगी हुई है, जो कभी बुझने का नाम ही नहीं लेती। इसे आप युद्ध भी कह सकते हैं। पूर्वजों के विरासत - जल, जंगल और जमीन बचाने का युद्ध। आदिवासियों ने यह युद्ध पहले गोरे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा और अब अपने काले अंग्रेजों से लड़ रहे हैं। झाड़-जंगल का यह इलाका अचानक युद्ध भूमि में तब्दील... more
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यह बात सत्य है कि एक व्यक्ति अपने देश ,अपने राज्य और अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि करता है। एक व्यक्ति अपने आप मे एक अच्छा गाइड होता है , परंतु यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपने आप को किस तरह से प्रस्तुत करता है। बात दिसंबर 2015 की है। मैं अपने परिवार सहित दिल्ली से झारखण्ड रेल से सफर कर रहा था। हमारी रेल अपने समय से छः से सात घंटे देर से चल रही थी। जम्मूतवी एक्सप्रेस जो राउरकेला तक जाती है दिल्ली से होकर उत्तर प्रदेश और फिर हटिया झारखण्ड पहुँचती है। बड़े मजे से सफर का आनंद उठाते हुये हम लोग जा रहे थे। हमारे कोच मे कई तरह के लोग थे बड़े मजे कि बात यह होती है... more

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सत्ता के नशे में चूर न जाने कितने बादशाह , तानाशाह इतिहास में दफ़न हो गए। फिर भी शासक और शोषण के क्रूर सिद्धांत को हम इंसान आजतक समझ नहीं पाये हैं। पूरे विश्व का इतिहास पढ़ लें हरेक शासक वर्गों ने सिर्फ जुल्मों सितम के अलावा कुछ नहीं किया। उन शहंशाहों , महाराजों ,जागीदारों , सामंतों,पुरोहितों ने कभी भी अपने आवाम के लोगों के सुख दुःख की बाते नहीं की थी। अत्याचार, लगान, और अत्यधिक परिश्र्म करा कर इन्होंने अपने बड़े-बड़े शानदार खूबसूरत महल, मीनारऔर अपने अय्यासी के अड्डे बनाये। बेबीलोन से लेकर मिश्र,चीन से लेकर भारत इन देशो की प्राचीन इतिहास में इन तानाशाहों के जलवो... more
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अनुसूचित क्षेत्र के ‘आदिवासी समाज’ शिक्षित होने के बाद भी अपने अधिकारों के प्रति अनिभिज्ञ है !

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एक दिन मैने किसी न्यूज़ चेंनल मे किसी राजनीतिक पार्टी के एक प्रवक्ता को 'राष्ट्र' और ' राष्ट्रवाद ' की परिभाषा देते हुये कहते सुना की जो व्यक्ति देश की आस्था और संस्कृति के संवेदनाओं से प्रेरित होता है वही सच्चा "राष्ट्रवादी" होता है । मुझे यह विचार सुनने मे तो अच्छे लगे लेकिन कूछ प्रश्न मेरे मन उठ रहे थे । भारत जैसी विशाल और विविधता से भरा देश में "राष्ट्रवाद" की परिभाषा कोई एक समूह सुनिश्चित नही कर सकता । किसी के चिल्लाने भर से कोई राष्ट्रभक्त नहीं बन जाता।  क्या भारत के सभी लोग अपने संस्कृति और परम्पराओं से प्यार नहीं करते ?

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मैंने अपने अपने माता पिता से सुना था की जब वे लोग छोटे थे वे लोग अलग  'झारखण्ड  राज्य' आंदोलन में  झंडा लेकर सड़को में निकले थे और नारा लगाए थे " लड़ के लेबो झारखण्ड" और " अबुआ दिशोम ,अबुआ राज"। सन 1947 से 'झारखण्ड आंदोलन' में शामिल कई लोग नए 'आदिवासी राज्य'  के लिए सीने में गोली खाये और कुछ तो अलग  'झारखण्ड  राज्य' की आशा करते करते हुए दफ़न हो गए, मिटटी में मिल गए। लेकिन अपने जीवित रहते नहीं देख पाए।

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