लेख

2 जनवरी 2006 को हमारे 'हो' समाज के 12 लोग औधोगिक आतंकवाद का शिकार बने। पुराने जमाने में किसी बड़े काम के पहले इंसानों की बलि दी जाती थी,यह परंपरा बदस्तुर अभी भी जारी है।इस बार 1 या 2 नहीं पुरे 12 'हो' लोगों की बलि दी गई। ओड़िसा के जाजपुर जिला की सुकिंदा घाटी प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है,खनिज संपदा प्रचुर मात्रा में है।जाजपुर में अन्य भागों की तरह बाढ नही आता है।यहां आसपास हमारे 'हो' निवास करते हैं,जो स्वभाव से अत्यंत ही सरल हैं।उनके पास विरासत में हाथी,शेर और भालुओं से लड़कर जंगल काटकर बनाई गई उपजाऊ जमीन है। वैश्वीकरण के इस दौर में हर बड़ी कंपनी की नजर ऐसे ही... more

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" सेरेंगसिया घाटी पश्चिमी सिंहभुम के कोल्हान क्षेत्र के टोन्टों प्रखंड के अंतर्गत आता है जो चाईबासा से 30 km दक्षिण दिशा में है। सेरेंगसिया घाटी में आदिवासी हो लोगों का युद्ध आंदोलन का ही एक हिस्सा था,जिसको भारत के इतिहासकारों ने अपने किताबों में जगह नहीं दी। हम आदिवासी अपने हक के लिये लड़े तो हमें विद्रोही करार दिया गया। हो लड़ाकों की वीर भुमि में राजाबासा के पोटो सरदार,बलंडिया के बेराई डेबाय,नारा हो,टोपाये,इचाकुटी के जोटो,पाटा डुमरिया के पांडवा जोंको,सर्बिल के कोचे सुदरन आदि ने लालगढ और बड़पीढ के 21 गांवो के सरदारों ने ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ पुकम गांव के सामने... more

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तीर- धनुष आदिवासी समाज का हथियार नहीं बल्कि उस समाज का धार्मिक, सांस्कृतिक एंव सामाजिक पहचान हैं!!

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नए साल की पहली तारीख को जब लोग खुशियां मनाते हैं, तब खरसावां के आदिवासी अपनों की कुर्बानी के लिए आंसू बहाता है। आज भी यहां के आदिवासी क्षेत्र के लोग 1 जनवरी 1948 की घटना को याद कर सिहर उठते हैं, जब यहाँ के लोग अलग 'आदिवासी राज्य ' की मांग कर रहे सैकड़ों आदिवासियों पर प्रशासन द्वारा की अंधाधुंध फायरिंग का शिकार हुए थे।

इस घटना के लगभग 68 वर्ष बीत जाने के बाद भी झारखंड के वीर शहीदों को आज तक मान-सम्मान नहीं मिला। नए साल के स्वागत की जगह यहां के लोग इस दिन सैकड़ों शहीदों की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

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रानी दुर्गावती (5 अक्टूबर, 1524 – 24 जून, 1564)) भारत की एक वीरांगना थीं जिन्होने अपने विवाह के चार वर्ष बाद अपने पति दलपत शाह की असमय मृत्यु के बाद अपने पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बैठाकर उसके संरक्षक के रूप में स्वयं शासन करना प्रारंभ किया। इनके शासन में राज्य की बहुत उन्नति हुई। दुर्गावती को तीर तथा बंदूक चलाने का अच्छा अभ्यास था। चीते के शिकार में इनकी विशेष रुचि थी। उनके राज्य का नाम गढ़मंडला था जिसका केन्द्र जबलपुर था। वे इलाहाबाद के मुगल शासक आसफ खान से लोहा लेने के लिये प्रसिद्ध हैं।

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1947 में जब भारत ब्रिटिश शासको के अधीनता से आजाद हुआ तब भारत में कई देसी रियासते थी । भारत कई छोटे – छोटे प्रांतो में बटा हुआ था। तब भारत के महान राजनितिक लीडरो को यह चिंता सताने लगी की इतने बड़े भू- भाग के ‘देसी रियासतों’ को कैसे नियंत्रित किया जाए। इसी सोच ने भारत के सभी प्रान्तों को पुनर्गठित करने की मुहीम ‘सरदार बल्लभ भाई पटेल’ के नेतृत्व में शुरू किया गया। आजादी के बाद भारत में... more

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*तिलका मान्झी एक आदिवासी योद्धा*
*Tilka Manjhi Was The First Indian Freedom Fighter*

*1857 की क्रांति से 100 साल पहले ही अंग्रेज़ों के खिलाफ इस सेनानी ने उठा लिए थे हथियार*

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बड़ी-बड़ी निराशाओं के बीच, आज भी संघर्षशील आदिवासी समाज मनुष्य और मनुष्यता के बीच के बुनियादी रिश्तों और उसके मूल्य को अपनी पारम्परिक स्वशासन व्यवस्था के परिवर्द्धित स्वरूप में कायम करने में लगा हुआ है ताकि आधुनिक विकास के दौर में भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत हो सके, साथ ही, वैश्वीकरण, बाजारवाद और उपभोक्तावाद के खिलाफ भारतीय समाज तन कर, पूरी मजबूती के साथ खड़ा हो सके। 'आदिवासी' का तात्पर्य क्या है? महज एक अवधारणा कि इससे आगे भी कुछ…? इसकी बुनियादी अवधारणा क्या है? आधुनिक अवधारणा क्या है?

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झारखंड फिर से सुलग रहा है, जमीन के अंदर कोयले में लगी आग की तरह जो बीच-बीच में धधक-धधक कर बाहर निकल आती है। यह आग पिछले तीन सौ सालों से लगी हुई है, जो कभी बुझने का नाम ही नहीं लेती। इसे आप युद्ध भी कह सकते हैं। पूर्वजों के विरासत - जल, जंगल और जमीन बचाने का युद्ध। आदिवासियों ने यह युद्ध पहले गोरे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा और अब अपने काले अंग्रेजों से लड़ रहे हैं। झाड़-जंगल का यह इलाका अचानक युद्ध भूमि में तब्दील... more
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