लेख

रली एक प्रकार की जनजाति है। जो महाराष्ट्र् राज्य के थाने जिले के धानु, तलासरी एवं ज्वाहर तालुकाज में मुख्यत: दूसरी जनजातियों के साथ पायी जाती है। ये बहुत मेहनती और कृषि प्रदान लोग होते है। जो बास, लकडी, घास एवं मिट्टी से बनी टाइलस से बनी झोपडियों में रहतें है। झोपडियों की दीवारे लाल काडू मिट्टि एवं बांस से बांध कर बनाई जाती है, दीवारो को पहले लाल मिट्टि से लेपा जाता है उसके बाद ऊपर से गाय के गोबर से लिपाई की जाती है। वारली चित्रकला एक प्राचीन भारतीय कला है जो की महाराष्ट्र की एक जनजाति वारली

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वर्ष १८५५ में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमीनदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संताल जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संताली भाषा में 'हूल' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'विद्रोह'होता है। यह अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु-कान्हू, चाँद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संताल हल का नेतृत्व, शाम टुडू (परगना) के मार्गदर्शन में किया। १८५२ में

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भारतीय समाजशास्त्री भली भांति यह जानते हैं कि भारत मे हजारों वर्ष पूर्व आदिवासी समुदाय ने ही जंगल, पहाड़ एवं पहाड़ की कन्दराओं और गुफाओं मे आश्रय लेने के उपरांत जंगलों को साफ कर खेती करना सीखा, बनैले पशुओं को पालतू बनाया और एक स्थायी सामाजिक जीवन की शुरुवात की। प्रथम भारतीय ग्रामीण सभ्यता की नींव डालने वाले आदिवासी समुदाय ही थे। यही कारण है कि भारत का आदिवासी समुदाय अपने जल जंगल और ज़मीन से पृथक नहीं रह पाये।

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आज बांसवाडा के एक प्रमुख अखबार ने डोगरू बावरू के नाम पर फिर से आदिवासी समाज को बदनाम करने की साजिश की है। पिछले 10-15 दिनों से बांसवाडा के जंगलों में आग लगने का कारण आदिवासी को बनाया जा रहा है।
साधारण सा सवाल दिमाग में कौंधता है कि क्‍या जो आदिवासी जल, जमीन और जंगल के बिना रह नही सकता है, जिस आदिवासी को जल जंगल जमींन जान से भी प्यारी होती है वो क्‍या इसे कभी जला सकता है ?

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"आदिवासी विचार मंच, महाराष्ट्र"
एवं
"राष्ट्रीय आदिवासी संस्कृति सम्मान परिषद"
द्वारा
दिनांक : रविवार, 23 अप्रैल, 2017 को
स्थान : उल्लास नगर, महानगर पालिकेचे, शहीद अरुण कुमार वैद्य सभागृह (टाऊन हाँल) सेंट्रल हॉस्पिटल सेजारी, उल्लासनगर-3, कल्याण, मुंबई (महाराष्ट्र) में -
सुबह 8:00 बजे से शाम 5 बजे तक एक दिवसीय -
"NATIONAL CONFERENCE OF AADIVASI EMPLOYEES"

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गोदना परम्परा आदिवासी संस्कृति परम्परा का हिस्सा रही हैं, प्राचीन काल से चली आ रही इस प्रथा के अन्तर्गत हमारा समुदाय प्रकृति मे मौजुद विभिन्‍न प्रकृति के अंगों का अंकन शरीर के विभिन्न अंगों पर करती रहीं हैं, इस संस्कृति-परम्परा के अन्तर्गत चेहरा, हाथों, पांवों एवं शरीर के विभिन्न हिस्सो पर पशु-पक्षी, पेड-पौधे, दैनिक जीवनोपयोगी वस्तुए जैसे- सोरी(रोटी-सब्जी व अन्य वस्तुए रखने का पात्र), सोरी नाम के समान ही शादी के समय भीत पर बनाई जाने वाला चित्रांकन, मोर, घर,दरवाजे, दूणी, फूल, पत्तियों, खजुर, स

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MOUTANA

आजकल रोज अखबार में , मिडिया में मौताना बन्‍द करने के लिये खबरें आती रहती है। मौताना प्रथा बन्‍द करने के लिये लगातार दूसरे समाजों के ला्ेागों यहां तक की खुद आदिवासी समाज के पढे लिखे लाेागों द्वारा निरन्‍तर मांग उठाइ जा रही है।

अब प्रश्‍न ये है कि मौताना है क्‍या

अगर आदिवासी समाज के वास्‍तविक इतिहास को देखा जाये तो आदिवासी समाज में मौताण नाम का कोई शब्‍द ही उपस्थित नही है। आदिवासी समाज में मौताण शब्‍द नही होकर मथमणा शब्‍द होता है

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आदिवासीयो के इस धरती के मालिक होने के और मानवधर्म पूर्वी संस्कृति होने के और हिन्दू न होने के सबसे प्राचीनतम जीवन्त साक्ष्यों में से एक
केबीकेएस डिस्कवर टीम द्वारा एक और नए व अदभुत गुफा चित्रों की खोज :

प्रथम विश्लेषण पर इनके तीन चरण दृष्टिगोचर हो रहे हैं.

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SCHEDULE AREAS OF INDIA

संविधान के अनुच्छेद 244 (1) में, ‘अनुसूचित क्षेत्र’ अभिव्यक्ति का अर्थ है ऐसे क्षेत्र जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों के रुप में घोषित करे ।

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एक दिन मैंने देखा मेरे घर के छत के मुंडेर पर एक छोटी सी, प्यारी सी नन्ही सी गोरैया ने अपना नया घोसला बनाया । वह छोटी गोरैया खूब चहचहाती फुदकती और अपने छोटी सी चोंच में घास के तिनके लेकर अपने घोसले को सजाने और सवारने में लगी रहती । अब तो मुझे छोटी गोरैया मेरे परिवार का ही कोई सदस्य लगने लगा था। उसका सुबह सुबह चहचहाना ,फुदकना ,उड़कर फुर्ती से अपने घोसले में बैठ जाना यह सब दृश्य मुझे बड़ा अच्छा का लगता था।

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