लेख

"आदिवासी विचार मंच, महाराष्ट्र"
एवं
"राष्ट्रीय आदिवासी संस्कृति सम्मान परिषद"
द्वारा
दिनांक : रविवार, 23 अप्रैल, 2017 को
स्थान : उल्लास नगर, महानगर पालिकेचे, शहीद अरुण कुमार वैद्य सभागृह (टाऊन हाँल) सेंट्रल हॉस्पिटल सेजारी, उल्लासनगर-3, कल्याण, मुंबई (महाराष्ट्र) में -
सुबह 8:00 बजे से शाम 5 बजे तक एक दिवसीय -
"NATIONAL CONFERENCE OF AADIVASI EMPLOYEES"
कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें देश भर के 25 राज्यों के लगभग 3000 आदिवासी कर्मचारी, अधिकारियों की सहभागिता होगी।

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गोदना परम्परा आदिवासी संस्कृति परम्परा का हिस्सा रही हैं, प्राचीन काल से चली आ रही इस प्रथा के अन्तर्गत हमारा समुदाय प्रकृति मे मौजुद विभिन्‍न प्रकृति के अंगों का अंकन शरीर के विभिन्न अंगों पर करती रहीं हैं, इस संस्कृति-परम्परा के अन्तर्गत चेहरा, हाथों, पांवों एवं शरीर के विभिन्न हिस्सो पर पशु-पक्षी, पेड-पौधे, दैनिक जीवनोपयोगी वस्तुए जैसे- सोरी(रोटी-सब्जी व अन्य वस्तुए रखने का पात्र), सोरी नाम के समान ही शादी के समय भीत पर बनाई जाने वाला चित्रांकन, मोर, घर,दरवाजे, दूणी, फूल, पत्तियों, खजुर, सूर्य-चन्द्र का अंकन भुजाओं, चेहरे पर, पावों पर पणिहारी का अंकन तथा (सूर्य चन्द्र तारे) आदि का अंकन... more

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MOUTANA

आजकल रोज अखबार में , मिडिया में मौताना बन्‍द करने के लिये खबरें आती रहती है। मौताना प्रथा बन्‍द करने के लिये लगातार दूसरे समाजों के ला्ेागों यहां तक की खुद आदिवासी समाज के पढे लिखे लाेागों द्वारा निरन्‍तर मांग उठाइ जा रही है।

अब प्रश्‍न ये है कि मौताना है क्‍या

अगर आदिवासी समाज के वास्‍तविक इतिहास को देखा जाये तो आदिवासी समाज में मौताण नाम का कोई शब्‍द ही उपस्थित नही है। आदिवासी समाज में मौताण शब्‍द नही होकर मथमणा शब्‍द होता है

और मथमना का अर्थ होता है - बदला।

एक सिर के बदले एक सिर का बदला।

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आदिवासीयो के इस धरती के मालिक होने के और मानवधर्म पूर्वी संस्कृति होने के और हिन्दू न होने के सबसे प्राचीनतम जीवन्त साक्ष्यों में से एक
केबीकेएस डिस्कवर टीम द्वारा एक और नए व अदभुत गुफा चित्रों की खोज :

प्रथम विश्लेषण पर इनके तीन चरण दृष्टिगोचर हो रहे हैं.

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SCHEDULE AREAS OF INDIA

संविधान के अनुच्छेद 244 (1) में, ‘अनुसूचित क्षेत्र’ अभिव्यक्ति का अर्थ है ऐसे क्षेत्र जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों के रुप में घोषित करे ।

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एक दिन मैंने देखा मेरे घर के छत के मुंडेर पर एक छोटी सी, प्यारी सी नन्ही सी गोरैया ने अपना नया घोसला बनाया । वह छोटी गोरैया खूब चहचहाती फुदकती और अपने छोटी सी चोंच में घास के तिनके लेकर अपने घोसले को सजाने और सवारने में लगी रहती । अब तो मुझे छोटी गोरैया मेरे परिवार का ही कोई सदस्य लगने लगा था। उसका सुबह सुबह चहचहाना ,फुदकना ,उड़कर फुर्ती से अपने घोसले में बैठ जाना यह सब दृश्य मुझे बड़ा अच्छा का लगता था।

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Responsibility जिसे आज तक हमारे शिक्षित आदिवासीयों ने अपने कंधो में नहीं ले पाए।

देश की आजादी के इन सत्तर वर्षों के उपरान्त हमारे आदिवासी समुदाय शिक्षित हुए और सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों को प्राप्त किये। यह उनकी मेहनत और लगन ही था की उन्होंने भारतीय समाज में अपना स्थान बनाया। लेकिन कहीं ना कही मुझे ऐसा लगता है की शिक्षा और सफलता की इस रेस में हमारे "आदिवासी समुदाय" आगे तो निकल गए लेकिन पीछे छूट गए उनके कुछ Responsibility अपने आदिवासी समाज के लिये ।

जी हाँ , Responsibility जिसे आज तक हमारे शिक्षित आदिवासीयों ने अपने कंधो में नहीं ले पाए।

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आज की स्थिति के जिम्मेदार किसी न किसी हद तक हम खुद भी है क्योकि आज जो हम इस देश के नागरिक है वो किसी न किसी रूप से हमारे बाप दादाओ की लालच की वजह से है , कुछ कोंग्रेस में घुस गए और अफवाह फैला दी कांग्रेस ने आदिवासियों के लिए काम किया है और वही विकास कर सकती है कुछ भाजपा में घुस गए आदिवासी को हिन्दू बनाकर धर्म की राजनीति चालू कर दी । अगर आज हम नागरिक नही होते तो आज हम भारत सरकार परिवार होते है ,  आज हम वो भाड़े की सरकार की योजना के भूखे हो गए 2 रुपये किलो सड़े गेहू मांगते हो गए जो सौ सौ क्विंटल a ग्रैड की गेहू उगाता था वो राशन की लाइन में लग गया, मालिक से नॉकर बन गया हैं, न्यायलयों के चक्कर... more

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गुजरात साबरकांठा जिले की खेड़ब्रह्मा तहसील लक्ष्मीपूरा पंचायत के ड़ाबीपुरा गांव में कल आदिवासी जागरूक युवा संगठन कोटड़ा ने की बैठक |
बैठक में स्थानीय स्कूल में पढ़ने वाली बालिकाओं के साथ की चर्चा | यहाँ का कार्यक्रम गीत भजन से शुरू हुआ | फिर बात चली की मैं आपके गाँव में आया हु बहनो आप मुझे क्या देंगे तो सभी बालिकाएं अलग अलग जवाब देने लगी |
बातचीत का ब्यौरा
बालिकाएं -: किसी ने कहा इमली,किसीने गेहू,मक्की,मुंग,यहाँ तक की किसी ने कहा गाय,बकरी |
विनोद -: आदिवासी जागरूक युवा संगठन के निदेशक विनोद ने कहा की नहीं मुझे ये सब नही चाहिए |

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उदयपुर जिले की कोटड़ा तहसील की समस्त स्कूल में शिक्षको की कमी को लेकर कई बार शिकायत दर्ज करवाने पर भी एक ही जवाब आता था |
3 मार्च2017 को जयपुर सीएम बंगले पर जाकर शिकायत देने के बाद उम्मीद थी की कुछ हो पायेगा |
किन्तु आज उस शिकायत का फ़ाइनल जवाब आया
जिसमे वही जवाब जो मुझे पहले कई बार मिल चूका है |
(विध्यालय में रिक्त पदों पर अध्यापक लगाने का कार्य डीपीसी एवं राजस्थान लोक सेवा आयोग से चयनित आशार्थी उपलब्ध होने के बाद ही कार्यवाही की जानी संभव होगी )
क्या होगा कोटड़ा तहसील की इन स्कूलों का जहाँ शिक्षको की कमी से बच्चो की स्थिति ख़राब है |

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