लेख

मुझे यह बात बड़ा अजीब लगता है की महानगरों में प्रदूषण का स्तर जिस तरह से बढ़ा है की अब तो सभी लोगों को मास्क लगातें हुये देखना अब आम बात हो गई है ।

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गोर्रा कोयतोरिन समाज का पवित्र_खाद्य_फसल है। जोकि गोर्रा गोण्डवाना के पवित्र “गो” से गोर्रा (रागी (वैज्ञानिक नाम - इल्युसिन कोरकाना, परिवार- धान्य),माड़िया - (जब हमे असभ्य #आर्य बहारी दिकू लोग, #हम_सभ्य_आदिवासियों को असभ्य और माड़िया बोले तब से रागी को “मड़िया, मडिया” बोला गया।) गोर्रा का खोज मेरे महान पुरखो द्वारा जो #गोडूम_दिप्पा ( गोण्डवाना के पवित्र “गो” से गोडूम दिप्पा ( मरहान, टिकरा,) में गोर्रा की पवित्र खेती की जाती है।

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सोनी सोरी ( छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित जबेली गाँव की एक आदिवासी विद्यालय शिक्षिका हैं।सन् 2011 में पुलिस द्वारा यह इल्जाम लगाया गया कि वे नक्सलियों को सूचनाएं उपलब्ध करवाती हैं। सोनी सोरी को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया और छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया गया। कोर्ट में पेशी से पहले इन्हें दो दिन की पुलिस हिरासत में रखा गया, जहां छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा उन्हें नंगा किया गया और बिजली के झटके लगाए गए। थर्ड डिग्री टार्चर की वजह से कोर्ट में पहले दिन पेशी के दौरान वे चल भी नहीं पा रहीं थ

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असुर भारत में रहने वाली एक प्राचीन आदिवासी समुदाय है। असुर जनसंख्या का घनत्व मुख्यतः झारखण्ड और आंशिक रूप से पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में है। झारखंड में असुर मुख्य रूप से गुमला, लोहरदगा, पलामू और लातेहार जिलों में निवास करते हैं। समाजविज्ञानी के. के. ल्युबा के अनुसार वर्तमान असुर महाभारत कालीन असुर के ही वंशज है। असुर जनजाति के तीन उपवर्ग हैं- बीर असुर, विरजिया असुर एवं अगरिया असुर. बीर उपजाति के विभिन्न नाम हैं, जैसे सोल्का, युथरा, कोल, जाट इत्यादि.

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छाउ एक आदिवासी नृत्य है जो बंगाल, ओड़ीसा एवम झारखंड मे लोक्प्रिय है।
छाउ नृत्य सामरिक भंगिमाओं और नृत्य का मिश्रण है। इसमे लडाई कि तकनीक एवम पशु कि गति और चाल को दर्शाया जाता है। इसमें ग्रामीण गृहिणी के काम-काज पर भी नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। इसे पुरुष नर्तक स्त्री का वेश धरकर करते हैं।
यह नृत्य परंपरागत लोक संगीत की धुन के साथ प्रस्तुत किया जाता है। इसके साथ प्रयुक्त होने वाले वाद्ययंत्रों में तरह-तरह के ढोल, धुम्सा और खर्का के साथ मोहुरि एवम शहनाई भी शामिल हैं।

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तिलका माँझी उर्फ जबरा पहाड़िया (11 फ़रवरी 1750-13 जनवरी 1785) भारत के आदिविद्रोही हैं। दुनिया का पहला आदिविद्रोही रोम के पुरखा आदिवासी लड़ाका स्पार्टाकस को माना जाता है। भारत के औपनिवेशिक युद्धों के इतिहास में जबकि पहला आदिविद्रोही होने का श्रेय पहाड़िया आदिम आदिवासी समुदाय के लड़ाकों को जाता हैं जिन्होंने राजमहल, झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रितानी हुकूमत से लोहा लिय

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जयपाल सिंह मुण्डा का जन्म झारखंड के खूंटी नाम का एक छोटे से कस्बे मे 03 जनवरी 1903 मे हुआ था । इन्होने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा रांची के सैंट पॉल स्कूल से प्राप्त किया था । वहाँ के प्रधानाचार्य ने आगे की शिक्षा के लिये उन्हे इंग्लैंड भेजा । स्कूल की शिक्षा पाने के बात उन्होने उच्च शिक्षा ऑक्स्फर्ड विश्वविद्यालय से प्राप्त की । ऑक्स्फर्ड में ही उन्होंने हॉकी टीम में अपनी अलग जगह बना ली थी । 1928 को एम्स्टर्डम ओलम्पिक द्वारा उन्हे भारतीय हॉकी को नेतृत्व करने की जिम्मेवारी सौंपी

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झारखंड की अपनी अलग संस्कृति और अपनी समवृद्ध विरासत रही है, एवम झारखंड के वीरों का अपना अलग विशेष इतिहास रहा है ।आज मैं झारखंड के एक ऐसे शक्शियत की बात कर रहा हूँ जिन्होने आदिवासियों के लिये झारखंड राज की मांग की प्रथम नींव रखी थी । आप समझ गये होंगे , जी हाँ , मैं उन्ही महान शक्शियत ‘जयपाल सिंह मुण्डा’ की बात कर रहा हूँ जिसे झारखंड की जनता ने ‘मरांग गोमके’ से नवाजा था यानी एक महान अगुआ । जयपाल सिंह मुण्डा एक ऐसा नाम और एक ऐसा आदिवासी नेता हैं जिसने ना सिर्फ झारखंड आंदोलन को परवान चढ़ाया बल्कि उ

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