लेख

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।" ~~~~~~~~~~~~~~~~ खजूर के पेड़ के भाँति बड़े होने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि इससे न तो यात्रियों को छाया मिलती है, न इसके फल आसानी से तोड़े जा सकते हैं | आर्थात बड़प्पन के प्रदर्शन मात्र से वह बड़ा नहीं हो जाता। कबीर जी के हर दोहे में गुढार्थ और चिंतन छिपे रहते हैं। जिसको जिस तरह से समझना होता हैं वह उसी तरह से समझकर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करता हैं। देखा जाए तो इस दोहे में भी बड़े व्यक्ति के लिए खजूर के पेड़ को आधार मानकर

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वागड़ और गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ को राजस्थान के जलियावाला बाग नाम से जाना जाता हैं। यह बलिदान की धरती है जहां स्वदेशभिमान के लिए सर्व सामान्य से सर्वस्व समर्पित कर दिया। मार्गशीर्ष पूर्णिमा की धवल चांदनी यहां आज भी रक्तिम हो उठती है जबकि इस मौके पर यहां लोग पहुंचते है। उनकी आंखों के सामने निर्दयी हाथों से उठे बारूदी शस्त्र और असहाय परन्तु सत्याग्रही आदिवासियों के सम्मेलन का दृश्य सजीव हो जाता है। जिसका परिणाम रक्तापात हुआ।
 

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हमारे आदिवासी समाज में जो भी मुहावरे बोलचाल की भाषा में उपयोग लाये जाते रहे हैं वह कितने सही और अर्थपूर्ण हैं। आज भी कितने प्रासंगिक हैं भले ही इन मुहावरों को लिखित में किसी किताबों में नहीं रखा गया हो मगर आदिवासी समाज की बोलचाल में आज भी जीवित हैं। हमारे समाज का इतिहास और सँस्कृति भी पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से ही हस्तांतरित हुई हैं इसका लिखित प्रमाणित प्रतियाँ अर्थात् अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। इसका मुख्य कारण हमारा आदिवासी-समाज पूर्व में शिक्षित न होना। जिस मुहावरे को एक शीर्षक के रूप में मैं

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