लेख

अनुबंध 1.I (रेफरी। पैरा 1.5, चौधरी 1)

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रिश्ते होते हैं मोतियों की तरह कोई "गिर" भी जाए तो हमें "झुककर"उठा लेना चाहिए। ~~~~~~~~~~~~~~~~ सर्वप्रथम मेरा अनुरोध:-"मैं यह लेख किसी व्यक्ति विशेष, धार्मिकता, राजनीति या जाति विशेष पर नहीं लिख रहा हूँ बल्कि मेरे व्यक्तिगत विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ। यदि मेरे इस लेख से किसी को दुख होता हैं तो मैं पहले से क्षमा चाहता हूँ। क्योंकि मेरा आशय किसी को दुखी करना नहीं हैं। और न ही किसी व्यक्ति को ठोस पहुँचाने की हैं। नाराज करना भी मेरा मकसद नहीं हैं।जो इस लेख की प्रतिलिपि करते हुए उसमें कोई संशोधन या आपत्तिजनक बाते शामिल करता हैं तो उसके लिए संबंधित व्यक्ति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी होंगी,मेरी नहीं... more

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मैं यहाँ पर स्पष्ट करना चाहता हूँ की यह आलेख किसी समाजजन को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं बल्कि आदिवासी समाज में राष्ट्रीयता स्तर के नेतृत्व को लेकर जो तर्क वितर्क उत्पन्न हो रहे हैं, उस परिप्रेक्ष्य में कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ। हो सकता हैं यह मेरे व्यक्तिगत विचार किसी को पसंद न आए। अभी नेशनल जयस में आदिवासी समाज की राजनीति पार्टी को लेकर विचार मंथन चल रहा था। सभी जागरूक एवं चिंतनशील समाज सेवी द्वारा अपने अपने पक्ष को रखा। अच्छा लगा। ऐसी चर्चा को समय समय पर करना चाहिए। चाहे परिणाम नहीं निकलता हो कम से कम ऐसी परिचर्चा से हम अपने कदम को सोच समझकर तो रख ही सकते हैं। जैसाकि विष्णुदेव... more

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हमे जागना होगा,हमे जागना होगा,
हर जगह आदिवासी जाग गए ,
बस हम ही सोये है,
हमे भी अब जागना होगा. हमे भी अब जागना होगा,
अपने अधिकार के लिए,
अपने सम्मान के लिए,
अपनी पहचान के लिए,
अपने समाज के लिए,
अपने भाई बंधुओ के लिए,
और खास तो स्वम् अपने लिए.
हमे जागना होगा हमे जागना होगा,
हर कोई अपनेअधिकार की बात करता है,
हर कोई अपने सम्मान की बात करता है ,
अब चुप नहीं बैठना होगा,अब हमे भी जागना होगा,
हमे जागना होगा,हमे जागना होगा
आज नहीं जगे तो कभी नहीं जागेंगे,
इसलिए आज ही जागना होगा !

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बदनावर जयस की जुझारू टीम ने अपनी मेहनत और एकता का परिचय देते हुए बदनावर शहर में दिनांक 15 नवंबर 2015 रविवार को हमारे आदिवासी समाज के भगवान बिरसा मुंडाजी का जन्मोत्सव मनाया गया। यही नहीं इस कार्यक्रम में बदनावर जयस के साथ साथ रतलाम, उज्जैन, बड़नगर, पीथमपुर, देवास, झाबुआ एवं कुक्षी के आदिवासी समाजजन उपस्थित हुए। बहुत बढ़िया रहा। जयस संरक्षक डॉ.

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मैंने आज एक किताब में "रिऐक्ट" और "रिस्पान्ड" के बारे में पढ़ा तो यकायक "शीर्षक" प्राप्त हुआ। वैसे देखा जाए तो किसी फिल्म में "देश भक्ति गीत" में भी कुछ बोल इसी तरह के थे। खेर छोड़ों। मुझे बात आदिवासी समाज के संगठित बने रहने के लिए कहना हैं। "सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं हमारी क्रिया-प्रतिक्रियाओं का" क्या शत प्रतिशत सही कही हैं। जब आज परिवार ही विघटन की दहलीज पर खड़ा हैं, तो समाज को संगठित करने में कितना समय और परिश्रम देना पड़ता हैं यह बात फील्ड अर्थात् धरातल पर रहकर कर ही कही अथवा समझी जा सकती हैं। परिवार और समाज को संगठित करने में भी "रिऐक्ट" और "रिस्पान्ड"... more

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"मरना वतन पे, जीना वतन पे" सिखाया आदिवासी वीर सपुतों ने ~~~~~~~~~~~~~~~~ आजादी के 68 साल और आदिवासी समाज। क्या पाया और क्या खोया ? यह अंतहीन प्रश्न का जवाब लाख ढूँढने पर भी कोई दे सकता हैं तो वह खुद आदिवासी समाज। एक दूसरे प्रश्न पर भी मेरा ध्यान जाता हैं क्या आदिवासी की स्थिति में कुछ बदलाव आया हैं ?

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"भारत देश को आजादी दिलाने में आदिवासी समुदाय का महत्वपूर्ण योगदान" ~~~~~~~~~~~~~~~~ मुझे दिनांक 05/08/15 को "मधुबन सामुदायिक रेडियो" पर हमारे जाने माने कार्यक्रम को लाइव प्रसारण करने वाले विनोद कुमार साहब द्वारा भी यही प्रश्न किया गया तथा इस संबंध में संक्षिप्त जानकारी चाही गई। उस समय मैं चूँकि कार्यालय में कार्य कर रहा था और दूसरा मोबाइल से अस्पष्ट आवाज के कारण मैं कुछ ज्यादा बता नहीं पाया इसलिए मैंने सोचा की क्यों न लिखकर ही सभी आदिवासी समाज को बताया जावें। साथियों आने वाले सप्ताह में दो महत्वपूर्ण त्योहार आने वाले हैं

(1) 09अगस्त 2015 विश्व आदिवासी दिवस।

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नवली कुमारी गरासिया मूलत राजस्थान राज्य सिरोही जिले की आबूरोड तहसील की पंचायत क्यारियाँ के रेडवा कला गाव की निवासी है ! जिसकी उम्र वर्तमान में २५ है ! नवली कुमारी आदिवासी परिवार से है जो की रेडवाकला पहाड़ी क्षेत्र में है ! नवली के परिवार मेँ उसके ९ बहने और दो भाई थे ! उनकी माता की भी मृत्यु उनके पिता के कुछ समय बाद ही हो गई ! घर मेँ नवें नम्बर के होने से उनका नाम नवली रखा गया ! पापा बीएसएनएल विभाग मेँ कार्य करते थे ! इस वजह से वे बहार रहते थे ! नवली ने अपनी १२वीं तक की पढाई आबूरोड की अर्बुद स्कूल से की ! इसी बीच उनके पापा की मृत्यु होने से नवली की आगे की पढाई नहीं हो पाई !

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सोयाबीन की वह फसल याद आती हैं, जब.........बरसात। ~~~~~~~~~~~~~~~~ यह तो केवल एक काल्पनिक कहानी हैं हकीकत कहीं इससे भी ज्यादा हैं। यह कहानी समाज के उस व्यक्ति को समर्पित हैं जिसको इससे गुजरना पड़ा। ग्रीष्मकालीन अवकाश समाप्ति पर हैं। मैं गाँव से शहर पढ़ाई के लिए जाने वाला हूँ। पिताजी के पास तीन बीघा जमीन के अलावा और आय का साधन नहीं था। इसलिए गाँव के ही पटेल से रुपये लाकर मेरे हाथों में थमाते हुए आश्वस्त किया कि अब तुम शहर में पढ़ाई अच्छी सी करना हमारी बिलकुल बिखर मत करना। हम यहाँ पर सब व्यवस्थित कर लेंगे। अबकी बार चना और मक्का के स्थान पर सोयाबीन की बुवाई करेंगे देखना हमारा सारा कर्जा उतर... more

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