लेख

भील जनजाति राजस्थान की प्रमुख प्राचीन जनजाति है। जिस प्रकार उत्तरी राजस्थान में राजपूतों के उदय से पहले मीणों के राज्य रहे, उसी प्रकार दक्षिणी राजस्थान और हाड़ौती प्रदेश में भीलों के अनेक छोटे-छोटे राज्य रहे है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में भील शब्द लगभग सभी बनवासी जातियों जैसे निषाद, शबर आदि के लिए समानार्थी रूप से प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार भील संज्ञा प्राचीन संस्कृति साहित्य में उस वर्ग विशेष के लिए प्रयुक्त की जाती थी जो धनुष-बाण से शिकार करके अपना पेट-पालन करते थे यह देखा गया है कि इस स्थिति को परवर्ती साहित्य में भी लगभग ज्यों का त्यों बरकरार रखा गया। मेवाड़ बागड़ और गोवाड़ प्रदेश में... more

READ MORE...

आदिवासी गांवों में हर गांव के किनारे हमें प्राय: सर्पाका आक़ति से मढी हुई अनेक मूर्तियां दिखाई देती है। आदिवासी समाज में यह खाखलिया बावसी के नाम से जानी जाती है। समाज मे परिवार के पूर्वजों के देहान्ता के उपरान्तम उनकी याद में इन मूर्तियों का निर्माण किया जाता है।

READ MORE...

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।" ~~~~~~~~~~~~~~~~ खजूर के पेड़ के भाँति बड़े होने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि इससे न तो यात्रियों को छाया मिलती है, न इसके फल आसानी से तोड़े जा सकते हैं | आर्थात बड़प्पन के प्रदर्शन मात्र से वह बड़ा नहीं हो जाता। कबीर जी के हर दोहे में गुढार्थ और चिंतन छिपे रहते हैं। जिसको जिस तरह से समझना होता हैं वह उसी तरह से समझकर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करता हैं। देखा जाए तो इस दोहे में भी बड़े व्यक्ति के लिए खजूर के पेड़ को आधार मानकर जो बात कही गई हैं उसी तरह मैंने भी अपने आदिवासी समाज के बड़े साधन सम्पन्न व्यक्तियों को संबोधित... more

READ MORE...

वागड़ और गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ को राजस्थान के जलियावाला बाग नाम से जाना जाता हैं। यह बलिदान की धरती है जहां स्वदेशभिमान के लिए सर्व सामान्य से सर्वस्व समर्पित कर दिया। मार्गशीर्ष पूर्णिमा की धवल चांदनी यहां आज भी रक्तिम हो उठती है जबकि इस मौके पर यहां लोग पहुंचते है। उनकी आंखों के सामने निर्दयी हाथों से उठे बारूदी शस्त्र और असहाय परन्तु सत्याग्रही आदिवासियों के सम्मेलन का दृश्य सजीव हो जाता है। जिसका परिणाम रक्तापात हुआ।
 

READ MORE...

हमारे आदिवासी समाज में जो भी मुहावरे बोलचाल की भाषा में उपयोग लाये जाते रहे हैं वह कितने सही और अर्थपूर्ण हैं। आज भी कितने प्रासंगिक हैं भले ही इन मुहावरों को लिखित में किसी किताबों में नहीं रखा गया हो मगर आदिवासी समाज की बोलचाल में आज भी जीवित हैं। हमारे समाज का इतिहास और सँस्कृति भी पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से ही हस्तांतरित हुई हैं इसका लिखित प्रमाणित प्रतियाँ अर्थात् अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। इसका मुख्य कारण हमारा आदिवासी-समाज पूर्व में शिक्षित न होना। जिस मुहावरे को एक शीर्षक के रूप में मैंने यहाँ उपयोग किया हैं उसका कारण सामाजिक संगठनों से हैं। आज हमारे आदिवासी समाज को हर कोई नेतृत्व कर... more

READ MORE...