लेख

पुरे विश्व में आदीवासियो सा अनुभव धन धान्य वीरता मन जैसा किसी का नही है । वर्तमान परिवेश में आदिवासी युवा वर्ग भी कि...सी से कम नही है ।
लगन मेहनत का जीता जगता उदहारण आदिवासी समुदाय है।पहले भी राजा महाराजा हुआ करते थे ।
• मुख्य बिंदु पर प्रकाश डालने पर आदिवासी इतिहास पढ़ने पर पुराने गढ़ किला बुजुर्ग द्वार ताल खेत पहाड़ पत्थर देखने पर सब आदिवासियों के रजवाड़े का बखान करते है ।भारत देश में ही समस्त राज्यो में आदिवासियों ने अपना इतिहास छोड़ दिया है। जो वर्तमान में युवा आदिवासी वर्ग देख रही है।

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दोस्तों में बहुत दिनों से बहुत से ऐसे आदिवासी संगठनो को देखा उनके काम करने तरीको को भी देखा है पर किसी भी संगठन में ये बात का उल्लेख नहीं है कि हमारी सबसे बड़ी ताकत है धन हमें धन संचय करना आवश्यक है! तभी हम हर प्रकार से आगे बढ़ पाएंगे इसी से हमारी उच्च शिक्षा हो सकती है ! आज जितने भी बड़े संगठन है वे सभी आर्थिक रूप से मजबूत है ! या जो व्यक्ति आर्थिक रूप से समर्थ है उसी की बात को तबज्जो दी जाती है . तो धन संचय हमारा पहला लक्ष्य होना चाहिए ! तथा हमारे समाज को भी आर्थिक रूप से संपन्न होना चाहिए हममे बचत की भावना को जगाना होगा .!

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हर इंसान की अपनी एक मंजिल होती है,जब तक वह इतना समझदार नहीं होता की उसे अपने जीवन में क्या करना है और किसके लिए तथा क्यों करना है | ये सब बातें किसी भी व्यक्ति के दिमाग में तब आती है जब कोई भी मनुष्य थोड़ा सा समझदार होता है ,देखिये ये वक्त भी तब आता है जब किसी इंसान के पास कई तरह की जिमेदारी आती है| लेकिन यहाँ पर सोचने वाली बात ये है की क्यों आखिर उस वक्त से पहले कोई समझता नहीं की मुझे अपनी जिंदगी में क्या करना !

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साथीयों काफी समय हो गया है हम सबको समाज की दयनीय हालात पर चिन्ता करते हुए पर चिन्तन नही करते। जी हां यह सच है कि हम सबकी चिन्ता जायज है पर यह भी सच है कि बिना चिंतन मनन किये कोई रास्ता भी नही निकलेगा इस दयनीय माली हालात को सुधारने का। आज काफी संख्या में युवा साथी बङे बुजूर्गों के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर समाज उत्थान हेतु हर समय तत्पर है तैयार है। जरूरत है बस सही दिशा में मार्गदर्शन करने की। और यह जिम्मेदारी है अनुभवी बुध्दीजीवीयों की। अगर अनुभवी ज्ञान और युवा शक्ती मिलकर विजन लेकर विकास पथ पर बढने लगे तो वो दिन दूर नही जब हमारा समाज भी विकास की मुख्य धारा से जुङा हुआ होगा। हमारा सबका... more

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कुछ साथीगण का यह सोचना हैं कि "आदिवासी समाज" को जगाओ स्वयं भी जाग जाए। मेरा मत हैं कि इस शब्द को सुसुप्त अवस्था में ही उपयोग में लाया जाता हैं। इस अनुसार तो हमारा "आदिवासी-समाज " सोया ही कब तो उसको जगाने को जरूरत आन पड़ी। यहाँ पर मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि "जगाने" शब्द के स्थान पर यदि "शिक्षित" शब्द का उपयोग किया जाता हैं, तो सर्वथा उपयुक्त होगा। आदिवासी समाज में यदि सभी को संगठित करना हैं,तो समाज के प्रत्येक व्यक्ति को "शिक्षित" होना बेहद जरूरी हैं वरना हम विकास की सीढ़ी को कभी नहीं चढ़ पाएँगे। बात "आदिवासी समाज के सृजनता" की हैं,तो सबसे ध्यान देने वाली बात यही हैं कि "सृजन में... more

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भील जनजाति राजस्थान की प्रमुख प्राचीन जनजाति है। जिस प्रकार उत्तरी राजस्थान में राजपूतों के उदय से पहले मीणों के राज्य रहे, उसी प्रकार दक्षिणी राजस्थान और हाड़ौती प्रदेश में भीलों के अनेक छोटे-छोटे राज्य रहे है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में भील शब्द लगभग सभी बनवासी जातियों जैसे निषाद, शबर आदि के लिए समानार्थी रूप से प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार भील संज्ञा प्राचीन संस्कृति साहित्य में उस वर्ग विशेष के लिए प्रयुक्त की जाती थी जो धनुष-बाण से शिकार करके अपना पेट-पालन करते थे यह देखा गया है कि इस स्थिति को परवर्ती साहित्य में भी लगभग ज्यों का त्यों बरकरार रखा गया। मेवाड़ बागड़ और गोवाड़ प्रदेश में... more

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आदिवासी गांवों में हर गांव के किनारे हमें प्राय: सर्पाका आक़ति से मढी हुई अनेक मूर्तियां दिखाई देती है। आदिवासी समाज में यह खाखलिया बावसी के नाम से जानी जाती है। समाज मे परिवार के पूर्वजों के देहान्ता के उपरान्तम उनकी याद में इन मूर्तियों का निर्माण किया जाता है।

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"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।" ~~~~~~~~~~~~~~~~ खजूर के पेड़ के भाँति बड़े होने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि इससे न तो यात्रियों को छाया मिलती है, न इसके फल आसानी से तोड़े जा सकते हैं | आर्थात बड़प्पन के प्रदर्शन मात्र से वह बड़ा नहीं हो जाता। कबीर जी के हर दोहे में गुढार्थ और चिंतन छिपे रहते हैं। जिसको जिस तरह से समझना होता हैं वह उसी तरह से समझकर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करता हैं। देखा जाए तो इस दोहे में भी बड़े व्यक्ति के लिए खजूर के पेड़ को आधार मानकर जो बात कही गई हैं उसी तरह मैंने भी अपने आदिवासी समाज के बड़े साधन सम्पन्न व्यक्तियों को संबोधित... more

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वागड़ और गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ को राजस्थान के जलियावाला बाग नाम से जाना जाता हैं। यह बलिदान की धरती है जहां स्वदेशभिमान के लिए सर्व सामान्य से सर्वस्व समर्पित कर दिया। मार्गशीर्ष पूर्णिमा की धवल चांदनी यहां आज भी रक्तिम हो उठती है जबकि इस मौके पर यहां लोग पहुंचते है। उनकी आंखों के सामने निर्दयी हाथों से उठे बारूदी शस्त्र और असहाय परन्तु सत्याग्रही आदिवासियों के सम्मेलन का दृश्य सजीव हो जाता है। जिसका परिणाम रक्तापात हुआ।
 

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