लेख

भारतवर्षीय गोंड आदिवासी महासभा , देवरिया (उत्तर प्रदेश) यह एक संगठन है । यह गोंडवाना के विकास के लिये कई वर्षो से कार्यरत है। यह संगठन गोंडवाना को राजनितिक , समाजिक , आर्थिक , संवैधानिक , आधिकार दिलाने के लिये हमेशा कार्यरत रहता है।

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गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक राजगुरू दादा हीरा सिन्ह मरकाम जी है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज को एकात्रीत करना । राजनैतिक अधिकार दिलाना, समय -समय पर जन-जगणन करना, सभी गोंडवाना पर्व ,गोंडी धर्म, गोंडी सभ्यता , आदि नैव-युवको जानकारी प्रदान करना।
गोंडवाना रत्न श्री दुखन प्रसाद गोंड जी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के विकास के लिये उत्तर प्रदेश मे कार्यरत है। उत्तर प्रदेश के गोंडवाना के लोगो को
लागातार जागरुक करने के प्रयास मे लगे है।

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गोंडवाना नोबेल & शिक्षक रत्न श्री बीर बहादुर प्रसाद गोंड जी , उत्तर प्रदेश राज्य ब्यूरो प्रमुख ( गोंडवाना समय पत्रिका ) ,
ओलम्पियाड को -आर्डिनेटर इण्टरनेशनल है।

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गोंडवाना के राजा शंकर शाह जी बहुत प्रतापि राजा थे। इनका एक अपना स्वतन्त्र राज्य था। इनके पुत्र कुवर रघुनाथ शाह जी थे । यह भी एक प्रतापि योधा थे। इन दोनो कि वीर गाथा पुरे गोंडवाना लैण्ड मे गाई जाती है।............

अमर शहीद वीर नारायण गोंड जी का राज्य सोना खान मे था।

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गोंडवाना समय पत्रिका के माध्यम से देश व समाज के बारे मे सभी देशवासियो को समय-समय पर सभी समाज की घटनाओ से अवगत कराना ।
देश के समाजिक ,आर्थिक , राजनैतिक, भगोलिक , मानसुन , आदि सभी कि जानकारी प्रदान कराता है। इस पत्रिका मे सभी समाचार को बराबर अंक दिया गया है।

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भराड़ी *भर* धातु से बना शब्द है ।जो कि दो शब्दों से मिलकर बना शब्द है ।(1)भर (2)आड़ी । भर + आड़ी अर्थात भराड़ी । भर का शाब्दिक अर्थ होता है -- भर अर्थात भरना और - भरने वाली - भरण पौषण करने वाली । तथा आड़ी शब्द का अर्थ होता है - आड़े आने वाली - रक्षा करने वाली - संरक्षिका - रक्षिका अर्थात माँ - माता । इस तरह भराड़ी का व्याख्यात्त्मक अर्थ यह हुआ कि संकट के समय में या हर परिस्थिति में हमारा साथ देने वाली - भरण - पौषण - रक्षण करने वाली भूमि या प्रकृति जो कि माँ का प्रथम स्वरूप है ।इसके साथ ही वे प्रथम महामानव मातृपितृ जिनके संयोग से हमारा अर्थात हमारे पुरखों का सतत् अवतरण होता आया है उनकी भी... more

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रली एक प्रकार की जनजाति है। जो महाराष्ट्र् राज्य के थाने जिले के धानु, तलासरी एवं ज्वाहर तालुकाज में मुख्यत: दूसरी जनजातियों के साथ पायी जाती है। ये बहुत मेहनती और कृषि प्रदान लोग होते है। जो बास, लकडी, घास एवं मिट्टी से बनी टाइलस से बनी झोपडियों में रहतें है। झोपडियों की दीवारे लाल काडू मिट्टि एवं बांस से बांध कर बनाई जाती है, दीवारो को पहले लाल मिट्टि से लेपा जाता है उसके बाद ऊपर से गाय के गोबर से लिपाई की जाती है। वारली चित्रकला एक प्राचीन भारतीय कला है जो की महाराष्ट्र की एक जनजाति वारली द्वारा बनाई जाती है। और यह कला उनके जीवन के मूल सिद्धांतो को प्रस्तुत करती है। इन चित्रों में... more

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वर्ष १८५५ में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमीनदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संताल जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संताली भाषा में 'हूल' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'विद्रोह'होता है। यह अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु-कान्हू, चाँद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संताल हल का नेतृत्व, शाम टुडू (परगना) के मार्गदर्शन में किया। १८५२ में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा आरम्भ किए गए स्थाई बन्दोबस्त के कारण जनता के ऊपर बढ़े हुए अत्याचार इस... more

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भारतीय समाजशास्त्री भली भांति यह जानते हैं कि भारत मे हजारों वर्ष पूर्व आदिवासी समुदाय ने ही जंगल, पहाड़ एवं पहाड़ की कन्दराओं और गुफाओं मे आश्रय लेने के उपरांत जंगलों को साफ कर खेती करना सीखा, बनैले पशुओं को पालतू बनाया और एक स्थायी सामाजिक जीवन की शुरुवात की। प्रथम भारतीय ग्रामीण सभ्यता की नींव डालने वाले आदिवासी समुदाय ही थे। यही कारण है कि भारत का आदिवासी समुदाय अपने जल जंगल और ज़मीन से पृथक नहीं रह पाये। भारत के उत्तर पूर्वी राज्य, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, झारखंड , बिहार, ओडिशा, छतीसगढ़ एवं बंगाल आदि राज्यों मे कई आदिवासी समुदायों ने अपनी भाषा संस्कृति और सामाजिक... more

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आज बांसवाडा के एक प्रमुख अखबार ने डोगरू बावरू के नाम पर फिर से आदिवासी समाज को बदनाम करने की साजिश की है। पिछले 10-15 दिनों से बांसवाडा के जंगलों में आग लगने का कारण आदिवासी को बनाया जा रहा है।
साधारण सा सवाल दिमाग में कौंधता है कि क्‍या जो आदिवासी जल, जमीन और जंगल के बिना रह नही सकता है, जिस आदिवासी को जल जंगल जमींन जान से भी प्यारी होती है वो क्‍या इसे कभी जला सकता है ?

आदिवासी खुद जल जाएगा लेकिन जल जंगल जमीन को कुछ नहीं होने देगा। अरे वास्‍तविक प्रक़ति का रक्षक तो आदिवासी खुद है। आदिवासी प्रक़ति पूजक है, क्‍योकी उसी से आदिवासी की जिदंगी चलती है।

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