आदिवासी परम्‍पराऐं एवं मान्‍यताऐं

टेडा चिपटा

कोयतोरिन टेक्नोलॉजी में टेडा/चिपटा जिसमे बीज को वर्षो तक सुरक्षित रखा जाता है जो की कोयतोर्स अपने फसल के बीज को आने पीढ़ी (जनरेशन)में पूर्णअंकुरण हो और फ़सलोउत्पादन अधिक हो..इसलिए कोयतोर्स सुव्यवस्थित टेडा का बीज संरक्षण में करते है। जिसमे किसी भी प्रकार के किट,फंगस व अन्य परजीवियों का आक्रमण नही होता है क्योंकि उस टेडा/ चिपटा को रशोई रूम में होदेल (चूल्हे) (आग के धुंआ) के ठीक

उतरण - दिवी (काली चीडी) को तिल खिलने का आदिवासी पर्व

रीत-रूढ़ि से जुड़ा एक और ख़ास मौका आ रहा हे पढ़े लिखें सगाजनो **उतरण**यानि उत्तरायण=मकर सक्रांति अपनी अपनी रूढ़िगत ग्रामसभाओं में कैसे मनाया जाता हे इस पर आज चर्चा डिस्कस हो जाये

आदिवासी हिन्‍दु नही है

Adivasis are not Hindus

आदिवासी कौन है ?

आदिवासी कोनसा धर्म मानता है ?

आदिवासी की परम्‍परायें क्‍या है ?

आदिवासियों की कोई भी परम्‍परा अन्‍य धमों से मेल क्‍यो नही खाती है ?

एेसे अनेकों प्रश्‍न है जो यह सोचने पर मजबूर करते है कि आदिवासी वास्‍तव में कौन है ?

आईये आज देखते है कि आदिवासी कौन है

सकवा

127 वर्ष पुराना जनजातीय हिजला मेला और आदिवासी वाद् यंत्र सकवा :
सकवा दो बोंगा आड़ग काना....
संताल आदिवासी में मान्यता है कि सकवा वाद् यंत्र में बोंगा (भगवान) वास करते है.यह बोंगा का आवाज है.इससे बोंगा खुश होते है .यह भैस के सिंग का होता है.सिन्दरा,बाहा आदि धार्मिक अनुष्ठान में इसका प्रयोग किया जाता है.

तीर- धनुष आदिवासी समाज का धरोहर है

तीर- धनुष आदिवासी समाज का हथियार नहीं बल्कि उस समाज का धार्मिक, सांस्कृतिक एंव सामाजिक पहचान हैं!!

जोहार क्या है

JOHAR

[1]. यह शब्द AUSTROASIAN language family का है..तो इसका अर्थ उसी "ऑस्ट्रो एशियन भाषा परिवार" में ढूँढना संभव है.

[2]. Indo Aryan language family की भाषा "संस्कृत,हिन्दी,राजस्थानी,गुजराती" में इस शब्द का अर्थ ढूंढना मूर्खता तो है ही सही....दिशा भटकाने का षड्यंत्र भी है.

क्या आदिवासी समाज में मृत्यु भोज का आयोजन करना उचित हैं ?

क्या आदिवासी समाज में मृत्यु भोज का आयोजन करना उचित हैं ?आदिवासी समाज वैसे ही आर्थिक स्थिति से बेहद कमजोर हैं, और ऐसे में खर्चिले आयोजन करना समाज को पतन की ओर ले जाना माना जा सकता हैं।

खाखलिया बावसी - भील पूर्वजों के थानक

आदिवासी गांवों में हर गांव के किनारे हमें प्राय: सर्पाका आक़ति से मढी हुई अनेक मूर्तियां दिखाई देती है। आदिवासी समाज में यह खाखलिया बावसी के नाम से जानी जाती है। समाज मे परिवार के पूर्वजों के देहान्ता के उपरान्तम उनकी याद में इन मूर्तियों का निर्माण किया जाता है।