1 जनवरी 1948 - आदिवासियो का काला दिवस

नए साल की पहली तारीख को जब लोग खुशियां मनाते हैं, तब खरसावां के आदिवासी अपनों की कुर्बानी के लिए आंसू बहाता है। आज भी यहां के आदिवासी क्षेत्र के लोग 1 जनवरी 1948 की घटना को याद कर सिहर उठते हैं, जब यहाँ के लोग अलग 'आदिवासी राज्य ' की मांग कर रहे सैकड़ों आदिवासियों पर प्रशासन द्वारा की अंधाधुंध फायरिंग का शिकार हुए थे।

इस घटना के लगभग 68 वर्ष बीत जाने के बाद भी झारखंड के वीर शहीदों को आज तक मान-सम्मान नहीं मिला। नए साल के स्वागत की जगह यहां के लोग इस दिन सैकड़ों शहीदों की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

खरसावां गोलीकांड में आदिवासी लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गई थीं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सिर्फ 17 आदिवासियों की मौत हुई थी, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार इस घटना में सैकड़ों आदिवासी लोगों की जाने गई थीं।

इस घटना की तुलना तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने जालियावाला बाग की घटना से की थी।मरने वालों की सही तादाद का कोई अंदाजा नहीं।

इस घटना में जिंदा बचे जगमोहन सोय ने बताया, "उस दिन सैकड़ों आदिवासी अलग आदिवासी प्रदेश की मांग करने इकट्ठे हुए थे। आदिवासियों की आवाज काे दबाने प्रशासन ने उन पर फायरिंग कर दी, जिसमें मरने वालों की सही तादाद किसी को नहीं मालूम। प्रशासन ने लाशों को ठिकाने लगाने खरसावां के कुओं में फेंका था।"

आज तक मारे गए उन आदिवासी शहीदों को नहीं मिला सम्मान। गोलीकांड में मारे गए सभी शहीदों की पहचान आज तक नहीं हो सकी। उनके आश्रितों को मुआवजा या नौकरी नहीं मिली। हर साल पहली जनवरी को शहीद स्थल पर जुटनेवाले नेता अपने भाषण में शहीदों को मान-सम्मान दिलाने व आश्रितों को मुआवजा व नौकरी देने की सिर्फ घोषणा ही करते हैं।

- राजू मुर्मू

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Adiwai ek ho

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