हजारो वर्ष पुरानी रूढ़िवादी पारम्परिक आदिवासी प्रथा ' पत्थरगड़ी '

झारखंड के अनुसूचित क्षेत्र (पाँचवी अनुसूची क्षेत्र )के जनजाति समुदाय अपने क्षेत्र मे पारम्परिक रूढ़िगत ग्रामसभा और मांझी बाबा के सहमति से अगर पत्थर गाड़ते है तो किसी राजनीतिक दल को क्या अधिकार है की ग्रामीण जनजातियों को अपने ही निज क्षेत्र मे पत्थर जाने पर उन्हें ' राष्ट्र विरोधी' गतिविधि कह कर बदनाम करे । आख़िर उस पत्थर की पट्टियों मे ' राष्ट्रविरोधी ' बात लिखी गई थी ? उस पत्थर की पट्टियाँ मे अनुसूचित जनजातियों के संविधानिक अधिकार ही तो लिखे गये थे । अरे साहब ...भारत के संविधान मे ' अनुच्छेद 244' मे किसका जिक्र किया गया है ? अगर जनजाति समुदाय अपने क्षेत्र या सीमाने मे पत्थर गाड़ रहे थे तो किसी बाहरी लोगो को बोलने का कोई अधिकार नही । उनके पेट मे दर्द होना लाजिम है क्योकि उन्हे जबरन जनजातियों की जमीन अपने आकाओं को देना जो है । कितने गिर सकते हो ...घिन आती है ऐसे लोगो की सोच पर और उनके षडयंत्र पर । शायद ऐसे लोगो को जनजातियों के रूढ़िगत प्रथाओं की पूर्ण जानकरी नही ।

हमारे पुरखा तो हजारो वर्षो से अपनी भूमि मे पत्थर गाड़ते आ रहे है ताकि भूमि का मालिकियत और दावेदारी कर सके । जनजाति दर्शन मे विश्व के अन्य महाद्वीपों मे ऐसे प्राचीन शिलालेख देखने को मिलेंगे जिसे वहाँ के ' नेटिव ट्राइब' लोगो ने हजारो वर्ष पूर्व पत्थर गाड़े थे जिसका प्रमाण आज भी मेक्सिको , अमेरिका , अफ्रीका , मध्य एशिया , भारत , आस्ट्रलिया मे देखने को मिलेंगे ।

सदियो से हमारे ट्राइबल एरिया मे जमीन पर गैर आदिवासियो के कब्जे से बचाने के लिये भूमि मे झंडा या पत्थर गाड़ने की प्रथा रही है । इन बाहरी लोगो को Tribal Costumry law को समझना जरूरी है । भारत के Tribes द्वारा अपने जल , जंगल और जमीन की रक्षा के लिये लम्बा संघर्ष करते रहे । इस कारण British Government ने भारत के Tribal Community को Comman Civil Law से मुक्त रखा था और उन Tribal Community के संरक्षण लिये कई कानून बनाये थे । लेकिन विडम्बना यह है की भारत के दस राज्यो के जनजाति समुदाय को आज तक उनके रूढ़ियों और परम्पराओ को जीवित रखने वाला कानून ' अनुसूची पाँच ' को पूर्ण रूप से लागू नही होने दिया गया ।

अब जनजाति समुदाय जागृत हो रहे है और अपने अधिकारो को भी समझ रहे है

आज जब जनजाति समुदाय अपने जल , जंगल और जमीन की रक्षा के लिये आवाज उठाते है या आँदोलन करते है तो उन्हे राष्ट्रविरोधी ' और ' नक्सलवादी ' गतिविधि कह कर उन्हें रोकने की कोशिश की जाती है उन्हे जेल मे डाला जाता है उन जनजातियों पर IPC की धाराये लगाई जाती है । मैँ कहना चाहता हूँ की भारत का राष्ट्रपति जिस क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति क्षेत्र घोषित करते है उन क्षेत्र के जनजाति को संविधान मे ' The Member of Schedule tribe ' से सम्बोधित किया गया है । अगर कोई राजनीतिक दल या व्यक्ति ' अनुसूचित क्षेत्र के सदस्य ' को नक्सल कहे या जनजाति समुदाय को बदनाम करने की साज़िश करे तो क्या यह 'राष्ट्रविरोधी' नही है ?

जनजाति समाज के शिक्षित प्रबुद्ध बुद्धिजीवी वर्ग अगर अपने समाज के उत्थान के किये समाजिक जनजागृति लाने की कोशिश करे तो यह किसी भी राजनीतिक दल के व्यक्ति को यह अधिकार नही की जनजाति समुदाय को गलत शब्द बोल कर उन्हे ' राष्ट्रविरोधी ' और अलगावादी सम्बोधित करे ?

अब जनजाति समुदाय जागृत हो रहे है और अपने अधिकारो को भी समझ रहे है । -

राजू मुर्मू

Comments

<p>nice</p>

Bohat achha jankari h sir.. Hamare samaz ke logo ke liye

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