शिक्षा के लिए आईये, सेवा के लिए जाईये।चलो चलें स्कूल।

शिक्षा के लिए आईये, सेवा के लिए जाईये। चलो चलें स्कूल हम।

कुछ इस तरह के जुमले के साथ शिक्षण सत्र का आरंभ होता हैं। साथ में जुड़ जाते हैं आमजन की शिकायतों का अंबार। स्कूली शिक्षा के स्तर सुधारने के कई तरीके भी पेश किए जाते हैं। शिक्षक की उपस्थिति को लेकर तकनीकी प्रयोग की कड़ी में एक और प्रयोग एप के जरिए जुड़ने जा रहा हैं।वाकई शिक्षक की उपस्थिति पर नियंत्रण किया जा सकेगा परंतु स्कूल में शिक्षण कार्य की निगरानी का क्या होगा। शैक्षिक गुणवत्ता स्तर में वृद्धि के लिए शिक्षकों के साथ साथ हम पालकों को भी ध्यान देने की आवश्यकता हैं। शिक्षक तो समय पर स्कूल आ रहे परंतु हमारे बच्चे नियमित उपस्थित हो रहे हैं कि नहीं यह भी देखना होगा। पाठ्यक्रम अनुसार पढ़ाई हो रही हैं की नहीं। यह स्थिति ग्रामीण क्षेत्र विशेषकर आदिवासी अँचलों में अधिक रहती हैं। वहाँ पर माता - पिता या तो मजदूरी करने जाते हैं या फिर स्वयं के खेती गृहस्थी में। वहाँ पर शिक्षित साथियों को यह सब देखना चाहिए।

आजकल आदिवासी बच्चों में शिक्षा को लेकर जो असंतोष दिखाई देता हैं वह कार्य की अधिकता को लेकर होता हैं। उनको पढ़ाई के साथ साथ घरेलू कार्य भी करना होता हैं दूसरा आर्थिक स्थिति भी उच्चतर पढ़ाई में अवरोध पैदा करता हैं। आदिवासी समाज के बच्चे छात्रावास की सुविधाओं का उपयोग कक्षा पहली से दसवीं तक कर ही पाता हैं। आगे की पढ़ाई या तो धनाभाव के कारण नहीं हो पाती हैं या फिर शहरी क्षेत्रों में आवास समस्या प्रधान होती हैं। ऐसे में यदि आदिवासी समाज के संगठनों द्वारा एक "सहायता-कोष " उपलब्ध करवाया जाता हैं तो मैं समझता हूँ कि समाज के युवा लाभान्वित होकर पढ़ाई करते रहेंगे। मैं यहाँ पर यह बात स्पष्ट करना चाहता हूँ कि सहायता कोष में केवल संगठन ही सहभागिता हो ऐसा नहीं हैं हम प्रोफेशनल व्यक्ति भी शामिल हो सकते हैं। क्योंकि कहा भी गया हैं कि "केवल अक्षर ज्ञान ही शिक्षा नहीं हैं। सच्ची शिक्षा तो चरित्र-निर्माण और कर्तव्य का बोध हैं। यदि यह दृष्टिकोण सही हैं और मेरे विचार से तो यह बिलकुल ठीक हैं, तो तुम सच्ची शिक्षा-सेवा प्रदान कर रहे हो। सही शिक्षा व्यक्तिगत विकास तो करती ही हैं साथ ही साथ परिवार , जाति, समाज और राष्ट्र निर्माण में भी अपना योगदान देती हैं। इसलिए शिक्षित होने के लिए ही विद्यालय में प्रवेश किया जाए यह कदापि उचित नहीं हैं, बल्कि नि:स्वार्थ भाव को भी मन में लाना उचित होगा। यही भाव आगे चलकर सच्ची सेवाओं में जरूर तब्दील होगा।

 

 प्रस्तुति:-मोहनलाल डॉवर

जयस विकास परिषद्

बदनावर जिला धार (मध्यप्रदेश)

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