मानगढ़ पे जूमलों जागे महाराज

वागड़ और गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ को राजस्थान के जलियावाला बाग नाम से जाना जाता हैं। यह बलिदान की धरती है जहां स्वदेशभिमान के लिए सर्व सामान्य से सर्वस्व समर्पित कर दिया। मार्गशीर्ष पूर्णिमा की धवल चांदनी यहां आज भी रक्तिम हो उठती है जबकि इस मौके पर यहां लोग पहुंचते है। उनकी आंखों के सामने निर्दयी हाथों से उठे बारूदी शस्त्र और असहाय परन्तु सत्याग्रही आदिवासियों के सम्मेलन का दृश्य सजीव हो जाता है। जिसका परिणाम रक्तापात हुआ।
 

नजारा नरसंहार का
मार्गशीर्ष मास की कड़कती सर्दी, वातावरण हिमानी और रूह कंपाने वाला। रंग-बिरंगे अंगोछे लगाए, साड़ियां पहने ऊंट-घोड़ों पर सामान लादे, हाथों में रंग-बिरंगे झंडे लिए, तंबूरे की तड़-तड़ पर गैर करती, नाचती और ढोलक की थाप पर गरबा करती, मस्ती से सराबोर स्त्री-पुरूषों की टोलियां एक लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। कुशलगढ़, झाबुआ, झालोद, संतरामपुर, बांसवाड़ा और डूंगरपुर सभी दिशाओं से गोविन्द गुरू का धर्म का जयघोष लगाती जनमैदिनी माकणिया पर्वत, गुरूधाम मानगढ़ की ओर बढ़ रही है। संपूर्ण वनवासी अंचल में एक भाव भरी हलचल व्याप्त है। घृत एवं नारियलों की आहूतियों से उठती ज्वालाएं तथा सुगन्ध वातावरण को दिव्य आभा देती हुई पवित्र बना रही है। चारों ओर लगे रंग-बिरंगे झंड़ों, शंख, नगाड़ों एवं घटा ध्वनियों से वातावरण में आनंद एवं उत्साह व्याप्त हो रहा है। गोविन्द गुरू का “स्वातंत्र्य मंत्र” हम बदलेंगे युग बदलेगा वातावरण में गूंज रहा है।
भगत भीलों के ऋषि गोविन्द गिरी की तपस्या से ब्रिटिश शासन एवं रियासत की सत्ता डोलने लगी हे, तभी तो उनकी सेना ने चारों ओर से गुरू भक्तों को घेर लिया है। रक्त पिपासु कर्नल शटन के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने हवाई फायर से भयभीत करते हुए “बिखर जाओ वर्ना मारे जाओंगे” गर्जना की है। जन्मजात निडर, साहसी एवं स्वतंत्रता के दीवाने इन गीदड़ धमकियों से कब डरने वाले थे। फौजो, पलटनों के बादल उमड़ पड़े, तोपों की गड़गड़ाहट से आकाश गूंज उठा, गोलियों की बौछारें होने लगी। बुजदिलों का कायरतापूर्ण हमला प्रारंभ हो गया। पल भर में ही निरीह भक्तों की लाशे बिछने लगी। गोलियों की बौछारों ने बालक, वृद्ध ही नहीं दूध पीते शिशुओं तक को नहीं छोड़ा। चारों तरफ चित्कार एवं भगदड़मच गई। रक्त के फव्वारे उठे। मानगढ़ की भूमि ने शहीदों के रक्त से स्नान किया। भजन, गीत एवं शंख की स्वर लहरियां रूदन-विलाप-प्रलाप बन सिसकियों में खो गई। इतिहास बताता है 17 नवम्बर, 1913 की रात पन्द्रह सौ भारत माता के लाल शहीद हुए, परन्तु केसरिया साफों के तीन ढेर जलाने की जनश्रृति है।

बलिदानी गोविन्द गिरी
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार गोविन्द का जन्म 20 दिसम्बर, 1858 को डूंगरपुर रियासत के बांसिया (संड़सा) गांव में एक बनजारा परिवार में हुआ। बचपन में गांव के पुजारी से लिखना-पढ़ना सीखा। साधु संतों के सम्पर्क के कारण नित्य स्नान, पूजा पाठ, रूद्राक्षमाला धारण करना, मांस मदिरा का सेवन नही करना आदि धार्मिक संस्कार प्राप्त हुए। उनके सात्विक जीवन के कारण लोग उन्हें “भगतजी” तथा “गुरू” कहकर पुकारते थे। उन्हेंने एक बाबा राजगिरी गोसाई से उपदेश लेकर शिष्यत्व ग्रहण किया तब से वह गोविन्द गिरी कहलाने लगे।

भगवत गीता के प्रति दृढ़ आस्था रखने वाले गोविन्द गिरी को अपने समकालीन राजनीतिक एवं सामाजिक गतिविधियों की पूर्ण जानकारी थी। वह 1880-81 में स्वामी दयानंद से उदयपुर में मिले तथा दो वर्ष उनके साथ रहे। दयानंद के सत्संग के प्रभाव से ही कुछ समय पश्चात्‌ उन्होंने “संपसभा”  की स्थापना की। संपसभा के माध्यम से भीलों को संगठित करते हुए समाज सुधार के लिए आंदोलन चलाया। 1903  में मानगढ़ पहाड़ी पर मार्गशीर्ष पूर्णिमा को महायज्ञ का आयोजन किया। तब से प्रति वर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर वहां मेला लगने लगा। संपसभा का वार्षिक अधिवेशन भी होने लगा। “मानगढ़ पे जूमलों जागे है महाराज”, जैसे भजन आज भी गूंजते है। तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे तो बांसवाड़ा, डूंगरपुर तथा संतरामपुर भी छोटी-छोटी रियासतें थी। इन रियासतों में गरीब ग्रामीण एवं वनवासी समाज से वेठ वेगार की वसूली की जाती थी। शोषण की शिकार जनता की स्थिति में सुधार की हलचल मात्र राजाओं एवं ब्रिटिश अधिकारियों को संदेह में डाल देती थी।

संपसभा के सुधारों विशेषकर वेठ-वेगार नहीं करने एवं पंचायत के माध्यम से न्याय करने के निर्णयों को शासन ने अपनी अवहेलना माना। इस कारण राजा-महाराजाओं  ने गोविन्द गुरू को कुचलने का षड़यंत्र किया। इसी का परिणाम थी मानगढ़ की लोमहर्षक घटना, जिसमें असंख्य गुरू भक्त हताहत हुए। पूंजा धीरा नामक भील ने संतरामपुर के गठरा गांव के थानेदार की हत्या कर दी। गोविन्द गुरू को बंदी बनाकर थानेदार की हत्या के षड़यंत्र का झूठा आरोप गढ़कर फांसी की सजा सुना दी। किन्तु जन विद्रोह के भय से फांसी की सजा को 20 वर्ष के कारावास में बदल दिया गया। कुछ वर्ष पश्चात्‌ सजा को कम करते हुए 12 जुलाई, 1923 को उनको संतरामपुर जेल से रिहा कर दिया। उनके कुशलगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर तथा संतरामपुर रियासत में प्रवेश पर प्रतिबां लगा दिया गया। वे 1923-31 तक वह भील सेवा सदन झालोद के माध्यम से भगत दीक्षा एवं विचार क्रांति का कार्य करते रहे तथा 30 अक्टूबर, 1931 लीमडी (गुजरात) के निकट कम्बई गांव में देवलोक को प्राप्त हुए।

माकणिया पहाड़ी से मानगढ़
नरसंहार की घटना के पश्चात्‌ मानगढ़ पहाड़ी जिसे तब माकणिया पहाड़ी कहा जाता था, का सम्पूर्ण क्षेत्र प्रतिबंधित कर दिया गया। सन्‌ 1952 में गोविन्द गुझ के शिष्य जोरजी भगत ने यज्ञ कर पुनः धूणी प्रज्जवलित की । वर्तमान में इस स्थल पर हनुमान वाल्मीकि, भगवान कल्कि, राधाकृष्ण, बाबा रामदेव एवं गोविन्द गुरू की मूर्तियां स्थापित है। इस स्थल की देखरेख पूर्व विधायक नाथूराम भगत कर रहे है। यहां गुजरात तथा राजस्थान सरकार द्वारा निर्मित दो विश्राम स्थल बने हुए हैं राजस्थान सरकार द्वारा आनंदपुरी से यहां तक पहुंचने के लिए 14 किलोमीटर तक डामर की सड़क बनाई गई है। इससे इस स्थल का आकर्षण बढ़ा है।

मानगढ़ के निकट ही सलाकडेश्र्वर मंदिर अत्यंत मनोहारी प्राकृतिक स्थल है। आनंदपुरी से सलाकडेश्र्वर तथा गुजरात के संतरामपुर को डामर सड़क के द्वारा जोड़ने पर इस स्थल के पर्यटन दृष्टि से विकसित होने की विपुल संभावनाएं है।  मानगढ़ पहाड़ी पर गोविन्द गुरू के व्यक्तित्व कृतित्व संबंधी संग्रहालय निर्माण, ठहरने की उपयुक्त व्यवस्था, नग्न पहाड़ी पर वृक्षारोपण द्वारा सौर्न्यकरण के माध्यम से इस स्थल का विकास कर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गौरव स्थल को अपेक्षित मान देना सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं  ही नही हम सभी का कर्तव्य है।

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Comments

एक तीर एक कमान सर्व आदिवासी एक सामान

जय सेवा जय जोहर

हमारी आदिवासी समुदाय की संस्कृति सर्व श्रेष्ठ है
जय आदिवासी जय बांसिया भील

हमारी आदिवासी समुदाय की संस्कृति सर्व श्रेष्ठ है
जय आदिवासी जय बांसिया भील

Kus to kro javani me .Aag laga do pani me जय जौहार