प्रश्न आदिवासी समाज के अस्तित्व का।

मैं यहाँ पर स्पष्ट करना चाहता हूँ की यह आलेख किसी समाजजन को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं बल्कि आदिवासी समाज में राष्ट्रीयता स्तर के नेतृत्व को लेकर जो तर्क वितर्क उत्पन्न हो रहे हैं, उस परिप्रेक्ष्य में कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ। हो सकता हैं यह मेरे व्यक्तिगत विचार किसी को पसंद न आए। अभी नेशनल जयस में आदिवासी समाज की राजनीति पार्टी को लेकर विचार मंथन चल रहा था। सभी जागरूक एवं चिंतनशील समाज सेवी द्वारा अपने अपने पक्ष को रखा। अच्छा लगा। ऐसी चर्चा को समय समय पर करना चाहिए। चाहे परिणाम नहीं निकलता हो कम से कम ऐसी परिचर्चा से हम अपने कदम को सोच समझकर तो रख ही सकते हैं। जैसाकि विष्णुदेव सरजी ने अपने अनुभव को हमारे सामने एक हिदायत के रूप में रखा। मुझे यह लिखने की आवश्यकता इसलिए हुई की मैं भी अपनी जिज्ञासा को प्रस्तुत कर "किं कर्तव्य" की स्थिति से बच सकूँ। क्योंकि मैं भी एक आदिवासी हूँ इस नाते हमारे आदिवासी समाज की हर एक अच्छाई और बुराई से अवगत होना चाहता हूँ। आदिवासी समाज के सामने अपने अस्तित्व का प्रश्न तो हैं ही साथ ही साथ वर्तमान स्थिति में संगठित भी ठीक तरह से नहीं हैं। यदि ऐसा होता तो आदिवासी का नेतृत्व केवल एक संगठन जिसको हम एक नारे के रूप में कह सकते हैं~ "एक तीर एक कमान सभी आदिवासी एक समान" के रूप में एक ही प्लेटफार्म में होना चाहिए था। मैं कलेश सरजी द्वारा दिये गये उदाहरण एवं तर्क से भी सहमत हूँ, की हम पहले हमारी सक्षमता बना लें उसके बाद अगले नेतृत्व की और कदम बढ़ाएँ। खरते साहब एवं डॉक्टर साहब अलावाजी के विचार भी स्वागत योग्य हैं, आप दोनों ने भी राजनीति से दूर रहने का स्पष्ट संदेश हम सभी समाजजन के सामने रखा। ऐसा भी नहीं हैं की हम बिखरे पड़े हैं, बल्कि मैं तो यही कहूँगा की अब आदिवासी समाज अपने अधिकार और अस्तित्व को लेकर स्वयं ही संघर्षरत हैं वह किसी अन्य के भरोसे नहीं रह गया हैं। हम यदि आर्थिक अभाव से नहीं गुजरते तो राष्ट्रीय स्तर के नेतृत्व से भी पीछे नहीं हटते। अभी भी हमारा आदिवासी समाज शिक्षा, स्वास्थ्य और अपनी जंगल, जमीन से कोसो दूर हैं। पहले यदि हम इस तरफ अपना लक्ष्य रखते हैं तो समाज के विकास में कोई बाधा उत्पन्न कैसे हो सकती हैं और फिर हम नेतृत्व की ओर रुख कर सकते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए की जिसको तैरना नहीं आता हैं वह नदी से दूर ही रहे तो अच्छा हैं। हाँ यह हो सकता हैं की यदि तैरने की इच्छा हो तो कम से कम हम सिखाने वाले और साधन को तो साथ में रख ही सकते हैं।

@ जय आदिवासी युवा शक्ति@

प्रस्तुति~ मोहनलाल डॉवर

जयस विकास परिषद् बदनावर ~~~~~~~~~~~~~~~~

नोट:~ आप आदिवासी समाज से संबंधित मेरे आलेख "आदिवासी समाज" की वेबसाइट aadivasisamaj.com/ पर भी पढ़ सकते हैं।

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