तीर- धनुष आदिवासी समाज का धरोहर है

तीर- धनुष आदिवासी समाज का हथियार नहीं बल्कि उस समाज का धार्मिक, सांस्कृतिक एंव सामाजिक पहचान हैं!!

जिस तरह किसी देश की पहचान उसके झंडे से होती है.. किसी राज्य की पहचान उसके राजकीय चिन्ह से होती है..उसी तरह हर समाज का पहचान उसके अपने प्रतीक चिन्ह से होती है..जैसे:- सिख की पहचान उसके कंगन से होती है.ब्रहमणों की पहचान उसके जनैव से होती है.नेपालियों की पहचान उसके खूखरी से होती है..ठीक उसी तरह आदिवासियों की पहचान उसके तीर-धनुष से होती हैं..
आदिवासी समाज में जब बेटी बिदा होती है..तो वो अपने साथ अपने ससुराल तीर ले कर जाती है.जिसका एक कुडूख भाषा( उरॉव ) में जतरा गीत भी हैं.जो इस प्रकार हैं..
ख़ई ओंन्दरका कन्ना.न्...
होआ.भाईया रे...सेन्दरा टोंका.(बहु का लाया हुआ तीर ले जाओ भाई शिकार टांड)

बने..बरहा..लावा गे..
होआ भाईया ..रे.सेन्दरा टोंका.(जंगली सूअर मारने के लिए..ले जाओ भाई शिकार टांड)

दोस्तों आदिवासियों का इतिहास मौखिक और अलिखित है..इनका इतिहास लोक-कथाओं और लोक-संगीतो में मिलती है.जिसको न झूठलाया जा सकता है न ही छुपाया जा सकता है.दोस्तों.जिस तरह त्रिशूल की पूजा होती है..उसी तरह तीर की भी पूजा होती है..
झारखंड के संथालपरगना के दुमका जिले के आदिवासी छात्रवासों में 35 हजार तीर-धनुष बरामद किये गये जिसको पुलिस -प्रशासन ने हथियार का रूप देकर दर्जनों आदिवासी लड़कों को गिरफ्तार किया..तीर-धनुष को हथियार का नाम देकर आदिवासी संस्कृति एंव उसके धरोहर का अपमान किया गया हैं.जिस तरह त्रिशूल हथियार नहीं हैं.उसी तरह तीर भी हथियार नहीं हैं..आदिवासी आसमान में तीर छोडकर अपनी आस्था को प्रदर्शित करते हैं..गॉव के बच्चे बाहर पढने जाते है तो वे अपने साथ आस्था एंव अपनी पहचान के तौर पर तीर ले जाते हैं..भारत का संविधान में साफ..साफ लिखा गया हैं कि सबको अपनी पहचान के साथ जीने का अधिकार हैं..तो फिर क्यों आदिवासी की पहचान तीर-धनुष को हथियार का रूप देकर हमारी इतिहास और हमारी पहचान को कुचलने की कोशिश की जा रही...जबकि ' डिसकवरी ऑफ वेदास' में साफ लिखा गया है कि आदिवासी की पहचान का प्रतीक उसका तीर-धनुष हैं .

बरखा लकड़ा(पड़हा आदिवासी व्यवस्था की महिला विग्सं की प़डहा सचीव)

Comments

आदिवासी ही भारत सरकार हे

hello

अपने विचार यहां पर लिखें

Order
अपना मोबाईल नम्‍बर लिखे
Image CAPTCHA