'झारखण्ड की जनजातियाँ और उनकी वर्तमान स्थिति'

'झारखण्ड प्रदेश' जिसकी कल्पना देश की आजादी के पूर्व एक 'जनजाति बहुल प्रदेश' के रूप मे किया गया था । इस प्रदेश में लगभग 33 से भी ज्यादा जनजाति समुदायों का निवास सदियों से रहा है। मुख्यतः जनजाति समुदाय झारखण्ड के आंचलिक एवम वन प्रदेशो में निवास करते है और इनका जनजीवन बहुत ही सरल है। खेती इनका मुख्य पेशा है लेकिन इनका जीवन जंगलों पर भी आश्रित थे ।

इस कारण यहाँ के जनजातियों का अपने जल , जंगल और ज़मीन के प्रति अथाह प्रेम ही था । कालांतर में ये विभिन्न जनजातियों का अपना संवृद्ध समाज हुआ करता था इनके शक्तिशाली कबीले हुआ करते थे । वे जनजाति अन्य दूसरी सभ्यता से दूर ही रहते थे। किसी गैर जनजातियों का इनके क्षेत्रो में प्रवेश करना इनको पसंद नहीं था। मुग़ल काल में किसी भी मुगल बादशाह ने इनके क्षेत्रो में प्रवेश करने या हस्क्षेप करने की कोशिश नहीं की। लेकिन अंग्रेजो के भारत आगमन के बाद जिस प्रकार से वे उन जनजातियों के क्षेत्रो में घुसपैठ करने लगे तो उन जनजातियों को यह नागवार लगा। दूसरा सबसे बड़ा कारण इनके क्षेत्रो में 'अंग्रेज कम्पनी' द्वारा साहूकारों और जमीदारो को असीमित शक्तिया दी गई जिसके कारण जनजाति क्षेत्रो में साहूकारों और जमीदारो के जुल्म और अत्याचार वहां के स्थानीय जनजातियों पर बढ़ने लगा था। जंगल पहाड़ो और चट्टानों को साफ़ कर वहाँ के स्थानीय जनजातियों ने खेती योग्य भूमि बनाये लेकिन सीधे साधे उन जनजातियों की जमीन धोखे से साहूकारों और जमीदारो ने कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। अत्याचार की चरण सीमा जब हद से बढ़ने लगा तब यहाँ के स्थानीय जनजातियों ने जुल्म ,अत्याचार और गलत नीतियों के खिलाफ दुष्ट साहूकारों , जागीदारों और विदेशी शासकों के खिलाफ विद्रोह कर दिया कर दिया । आजादी से पूर्व कई जनजाति विद्रोह इस प्रदेश के सरजमीं पर हुई । इस कारण इस प्रदेश को ' हूल दिशोम' भी कहा गया । कोल विद्रोह , मुंडा विद्रोह , संताल विद्रोह , पहाडिय़ा विद्रोह , खेरवाल विद्रोह आदि कई जनजातियों ने अपने जल , जंगल और ज़मीन को बचाने के लिये विदेशी शासकों से संघर्ष करते रहे । झारखण्ड का छोटानागपुर , सिंहभूमि के शेर मुंडा , हो , खड़िया , ऊराओ , असुर , 'संतालपरगना ' क्षेत्र के शांत और मृदु भाषी संताल जनजातियों के असीम बलिदान की वीरगाथा छुपाये हुये है । यह कहना गलत नही होगा की झारखण्ड के सरजमीं को यहाँ के जनजातियों ने अपने रक्त से सींचा था । अंग्रेजों ने उन जनजातियों की जीवटता और संघर्ष को देखकर उन सीधे सरल जनजातियों के संरक्षण के लिये कानून बनाये । छोटानागपुर , संतालपरगना , और झारखण्ड के कोलहान क्षेत्र के जनजातियों के लिये विशेष कानून बनाये गये ताकि उन क्षेत्र के जनजाति आजादी अपने क्षेत्र मे अपने तरीके से जीवनयापन कर सके । 'छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908 ' और 'संतालपरगना काश्तकारी अधिनियम -1949" , सिंहभूम कोल्हान में विल्किंसन रूल 1837 झारखण्ड के जनजातियों के लिये बनाये गये विशेष कानून थे । भारत के आजादी के उपरांत जब भारत का संविधान बना तो संविधान के दसवें भाग मे अनुच्छेद 244 के अन्तर्गत दो अनुसूची बनाई गई । पाँचवी और छठवीं अनुसूची बनाकर भारत के कुछ राज्यों के जनजाति क्षेत्र को दो भागो मे बाँटा गया ताकि उन जनजातियों को उनके रूढ़ि और परम्परा के अनुसार स्वशासन चलाने का हक़ दिया जाय । भारत के उत्तर -पश्चिम राज्य असम ,मेघालय , त्रिपुरा , मिजोरम जिसको 'छठवीं अनुसूची' के रूप मे मान्यता मिला उन्हे अपना 'स्वशासी जिला 'और 'स्वायत्त परिषद' का अधिकार मिला परंतु ' पाँचवी अनुसूची' के क्षेत्र को आजादी के सत्तर वर्ष से जनजातियों के 'पारम्परिक स्वशासन' चलाने के अधिकार से वंचित किया गया। जबरन 'पांचवी अनुसूची' क्षेत्र में सामान्य कानून व्यवस्था के अनुसार आम चुनाव और पंचायत चुनाव को ही बल मिला। जिससे जनजातीय रूढ़िगत स्वशासन व्यवस्था जैसे मानकी मुंडा (कोल्हान क्षेत्र में ) , पड़हा राजा (छोटानागपुर क्षेत्र में ) और मांझी परगनैत ( संतालपरगना ) अधर पर लटका दिया गया । यह सब सिर्फ राजनीति और सत्ता पर बने रहने के लिए कुछ राजनीतिक दलों एवं कुछ महत्वकांक्षी लोगो कारण झारखण्ड के जनजातियों की दुर्दशा हुई है। झारखण्ड और भारत के अन्य नौ राज्यों में जहाँ 'पांचवी अनुसूची' Fifth Schedule Area चिन्हित किया गया संविधान के इतने महत्वपूर्ण प्रावधान 'पांचवी अनुसूची' और इस अनुसूची के 'पारा 4' में ( Schedule Tribe) एवं अनुसुचित क्षेत्र के विकास की जिम्मेवारी राज्य के Governor , Chief Minister , ' Tribes Advisory Council' के सदस्य जिनमे विधानसभा के तीन चौथाई ST MLA और जनजातीय समाज से जुड़े अन्य पांच सदस्यो यानी कुल 20 सदस्यों को 'अनुसूचित जनजाति' के कल्याण और उनके समुचित विकास एवं स्थानीय समस्याओं की निवृति के लिए राजपाल को सलाह देना इनका कर्तव्य था । लेकिन इन सत्तर वर्षो में जो जिम्मेवारी राज्य के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन लोग ऐवम कूछ महत्वाकांक्षी जनजाति के नेता और दलाल स्वेम अनुसूचित क्षेत्र के विकास के अवरोधक बने रहे । वे लोग अपनी सत्ता और प्रशासन चलाने में मसगुल रहे । ST MLA / MP और प्रदेश के मुख्यमंत्री को 'अनुसूचित क्षेत्र' और वहाँ के 'अनुसूचित जनजातियों' का विकास दिखाई ही नही दिया ! Political Parties के दांवपेंचों ने इस प्रदेश की दशा और दिशा दोनो ही बदल दी । उन Political Parties के आपसी खींचातानी ऐवम राजनीतिक अस्थिरता के कारण सत्तर वर्षो से 'Schedule Tribe Area ' को नज़रंदाज़ करते रहे। इसका दुष्परिणाम यह हुआ की जो कानून यहाँ के जनजातियों की भूमियों की सुरक्षा के लिये बनाई गई थी धूर्त और चालाक पूंजीपतियों , दलाल नेताओ और भ्र्ष्ट पदाधिकारियों द्वारा विकास के नाम पर उन सीधे सरल जनजातियों के ज़मीन की जम कर लूट मचाई गई । जंगल और उसके तराई क्षेत्रो में कई तरह की गतिविधिया बढ़ गई। जंगल और माइंस पर कब्ज़ा करने के लिए आधुनिक साहूकार (कॉर्पोरेट कंपनी ) राजनितिक एवं प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल सीधे साधे जनजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से विस्थापित करने के लिए किया गया । बेरोजगारी और गरीबी ने स्थानीय जनजातियों को अन्य राज्यों में पलायन करने के लिए विवस दिया । शिक्षा और आर्थिक विकास योजना का लाभ उन्हें नहीं मिल पाया क्योकि भ्र्ष्टाचारी बाबू और ऑफिसर की बदनीयती और उनके लालच ने उन जनजातियों के साथ छल कपट करके जनजाति समुदाय के विकास के लिये आने वाले सरकारी सहायता को उन जनजाति क्षेत्र तक नहीं पहुंचने दिया गया। । भारत सरकार द्वारा संचित निधि (कोष ) से जनजाति उप -विकास योजना के लिये राज्य सरकार को करोड़ों रुपये दिये जाते है लेकिन इन सत्तर वर्षों मे उन जनजातियों के कल्याण करने के लिये नाम मात्र ही खर्च की जाती है । यह प्रदेश प्राकृतिक संसाधनों से भरा है लेकिन यहाँ के स्थानीय जनजातियों की माली हालत बद से बत्तर होते चली गई। पहले वे लोग कृषि करके , वनो से लकड़ी , केन्दु पत्ता और वन उपज को बेच कर अपना गुजारा कर लेते थे लेकिन जिस प्रकार 'वन संरक्षण' या 'टाइगर फारेस्ट' जैसे परियोजनाओं के कारण जनजाति समुदाय के लोग जंगल भी नहीं जा सकते । जिसके कारण उनकी आजीविका का संकट पैदा हो रहा है । वर्तमान में भारत के दस राज्य 'अनुसूची पांच' में शामिल है जैसे - आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान और तेलंगाना। नये भारत के लोकतंत्र मे क्या उन जनजाति क्षेत्र को जिसे भारत का राष्ट्रपति ' अनुसूचित क्षेत्र ' के रूप मे चिन्हित करता है, क्या उन 'Schedule Tribe Area' को 'Fifth Schedule' को Implement करके पूर्ण विशेषधिकार प्राप्त होगा ?

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