गोर्रा (रागी, मंडुआ,मडिया)

गोर्रा कोयतोरिन समाज का पवित्र_खाद्य_फसल है। जोकि गोर्रा गोण्डवाना के पवित्र “गो” से गोर्रा (रागी (वैज्ञानिक नाम - इल्युसिन कोरकाना, परिवार- धान्य),माड़िया - (जब हमे असभ्य #आर्य बहारी दिकू लोग, #हम_सभ्य_आदिवासियों को असभ्य और माड़िया बोले तब से रागी को “मड़िया, मडिया” बोला गया।) गोर्रा का खोज मेरे महान पुरखो द्वारा जो #गोडूम_दिप्पा ( गोण्डवाना के पवित्र “गो” से गोडूम दिप्पा ( मरहान, टिकरा,) में गोर्रा की पवित्र खेती की जाती है।

जब हमारे महान दादा के दादा के....दादा के दादा लोग गोडूम दिप्पा में गोर्रा का खेती करना प्रारंभ किये तो हमारे कृषि/खेती के क्षेत्र में क्रांति आ गया परन्तु इस खेती की क्रांति (शुरुआत में) गोडूम दिप्पा का खोज और उस गोडूम दिप्पा को बनाने के लिए #गोडेल_मर्स (गोण्डवाना के पवित्र “गो” से गोडेल मर्स ( गोडेल टाँगया, बड़ा टाँगया.. जिससे बड़ी बड़ी पेड़ों व लकड़ियों को काटने के लिए) का खोज, इनके साथ पशुओ का भी योगदान है क्यों कि सर्वप्रथम “नय” ( कुत्ता) को नियंत्रण/पकड़े जिससे शिकार करने में आसानी होगया, उसके पश्चात “नय” (कुत्ता) के माध्यम से #कोंदाल (#कोयापुनेम के पवित्र “क” से कोंदाल, बुडाल, बैल... इस लिए #महान_शम्भू_शेक के किनारे पवित्र कोंदाल विराजमान होता है।) को नियंत्रण/पकड़े जो कि #हेर_पुहला (नांगर,हल जोतने),गाडा(बैलगाड़ी) में उपयोग हुआ और कृषि ने विकास की गति पकड़ा। ............ तभी खेती में क्रांति आया जो हमारे #कोयतोरिन_टेक्नोलॉजी में गोर्रा में से #कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन,खनिज लवण इत्यादि की पूर्ति के साथ-साथ हम में #रोग_प्रतिरोधक_क्षमता का भी विकास होता गया...जैसे गर्मी के दिनों में वस्यक, सियान (बुजुर्ग) व #नवजात_शिशुओं को “ लू ” ( #वातावरण_तापमान का शरीर के तापमान से आदिक होना) लगता है तब हमारे #महान_याया { याया एक ऐसा उच्चारण है जिसमे किसी भी प्रकार का बल नही लगता है} (माँ) #गोर्रा ( रागी)के आटे को नाभि व सिर, तारू में लगा देतीं हैं जिससे कि शरीर का तापमान कम/ बराबर व स्थिर होता है जोकि हमे “लू” से बचाता है। और यदि #गोर्रा_जावा का निरंतर उपयोग किया जाए तो #मधुमेह जैसे बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है। इससे यह साबित होता है कि #कोयापुनेम में सभी चीजें अपने-अपने स्थान पर सुव्यवस्थित है और कोया समाज को #इकोनोमिकल परेशानी नही होता है।........ #कोयतोरिन_टेक्नोलॉजी में गोर्रा से विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री का निर्माण किया जाता है जैसे #गोर्रा_जावा ( #माडिया_पेज जो कि एक पेय पदार्थ [बेवरेजस] है) माल्ट, रोटी, इत्यादि।

#गोर्रा_जावा में अनेको गुण होते है जो हमारे शरीर मे #प्यास के साथ-साथ #भूख व #थकान( शरीर मे ठण्डक प्रधान करती है।) को भी दूर करता है। और गोर्रा जावा को एक जगह से दूसरे जगह/“लोन” (घर) से “गोडूम दिप्पा” तक लेजाने के लिए एक विशेष प्रकार की #बर्तन का उपयोग किया जाता है जिसे #बुर्का ( तुमड़ी/ तुमा ) कहा जाता है और (बुर्का लंजेनेरिया स्प्प.【लौकी】से बनाया जाता है।) बुर्का में गोर्रा जावा को लंबे समय तक गर्म व ठन्डा रूप में रखकर उपयोग सकते है। और जब #इरुक_पुंगार (महुआ फूल) बीनने जाते है व जंगलो में #शिकार करने जाते है तब या फिर गोडूम दिप्पा में खेती कार्य करने जाते है तब कोया लय्योर अपने कन्धों में बुर्का रखकर के गोर्रा जावा को साथ लेके जाते है।...................................

कोयपुनेम अनंत है..........

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