गोदना परम्परा

गोदना परम्परा आदिवासी संस्कृति परम्परा का हिस्सा रही हैं, प्राचीन काल से चली आ रही इस प्रथा के अन्तर्गत हमारा समुदाय प्रकृति मे मौजुद विभिन्‍न प्रकृति के अंगों का अंकन शरीर के विभिन्न अंगों पर करती रहीं हैं, इस संस्कृति-परम्परा के अन्तर्गत चेहरा, हाथों, पांवों एवं शरीर के विभिन्न हिस्सो पर पशु-पक्षी, पेड-पौधे, दैनिक जीवनोपयोगी वस्तुए जैसे- सोरी(रोटी-सब्जी व अन्य वस्तुए रखने का पात्र), सोरी नाम के समान ही शादी के समय भीत पर बनाई जाने वाला चित्रांकन, मोर, घर,दरवाजे, दूणी, फूल, पत्तियों, खजुर, सूर्य-चन्द्र का अंकन भुजाओं, चेहरे पर, पावों पर पणिहारी का अंकन तथा (सूर्य चन्द्र तारे) आदि का अंकन करना। इस परम्परा के पीछे मान्यता रही है कि मृत्यु के बाद जब हमें जमरा के जौण लेने आऐंगे और हमारे द्वारा किये गये पापों का लेखा-झोखा मागंने पर हमारे शरीर पर अंकित चिन्हों को दिखाएंगे उनको देखेंगे तब तक हमारे पापों की सजा के तौर पर पिघलाया हुआ थम(थम्ब) ठण्डा हो जाएगा। इस परम्परागत संस्कृति से इस तथ्य की भी जानकारी मिलती हैं कि गैर आदिवासीयो द्वारा रचित ताना बाना (जाल) हमें हमारे विचारों को बदलकर हमें भगवान के नाम पर डराने के लिए महाभारत, रामायण, वेद, पुराण, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यकों, उपन्यासों आदि का इतना गहरा ताना बाना बुना गया है कि आने वाले भविष्य में हमारी परम्परा, विरासत, संस्कृति, धरोहर को समाप्त कर, हमें उनकी संस्कृति अपनाने पर मजबूर किया गया हैं, ताकि हमारा अस्तित्व समाप्त किया जा सके। लेकिन आज यह परम्परा धीरे-धीरे हमारे समुदाय से गायब होती जा रही हैं और गैर आदिवासीयो ने अपने मतलब या सौन्दर्यीकरण के रुप में परिष्करण के नाम पर हाईजेक कर लिया गया हैं, आज आदिवासीयो की यह परम्परा पुनःजीवित करने की महत्ती जरुरत हैं। फिल्म उध्योग से जुड़े व्यक्तियो के द्वारा इस परम्परा के नाम पर पैसे बटोरने का कार्य किया जा रहा हैं।

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