गाड़ीगडार का वाटे चालो तो कांई डरवा की वात नी....!

शीर्षक देखकर यह हर कोई आश्चर्य कर सकता हैं, की मानो मैं अब गाँव की बोली का आलेख प्रस्तुत कर रहा हूँ। जिस आदिवासी समाजजन ने भी मेरे आलेख पढ़े होंगे वह यह भलीभाँति जानते हैं, की मेरे आलेख के शीर्षक में गुढ़ार्थ छिपा रहता हैं। इसी तारतम्य में आज के आलेख में भी यही तथ्य को प्रस्तुत कर रहा हूँ। जैसाकि आप सभी जानते ही हैं की हम आदिवासियों का गाँव से सदियों पुराना नाता रहा हैं और आज भी हम गाँव से वैसे ही जुड़े हैं जैसे हर आदिवासी में अपनी आदिवासी सँस्कृति जुड़ी हैं। हम चाहे कोई भी शहर में चले जाएँ। हम कोई भी ओहदा पार कर लें हम न आदिवासी सँस्कृति को भूल सकते हैं और न ही हमारे गाँव को। तो बात करता हूँ आज के शीर्षक "गाड़ीगडार का वाटे चालो तो कांई डरवा की वात नी...............।" की।

जी हाँ। हम आदिवासियों की पहली खोज। जिसके बल पर हम हमारे गाँव से दूसरे गाँव या शहर तक की यात्रा बैलगाड़ी पर बैठकर तय की हैं। वह चाहे हाट बाजार करने की आवश्यकता हो या किसी कार्यक्रम में सम्मिलित होने की हो हमने हमेशा बैलगाड़ी का उपयोग किया हैं। गाँव के रास्ते बैलगाड़ियों के चलने से बन जाते फिर वर्षभर उसी का उपयोग करते। दो बैलों द्वारा लकड़ी की गाड़ी को खींचकर ले जाना उस गाड़ी में सामान सहित हमारा विश्वास के आधार पर बैठना आप इस अनुभूति को क्या कहना चाहेंगे। न दुर्घटनाओं का डर न ही पेट्रोल डीजल की फिक्र। दो पहियों की बनी "गडार" यने की रास्ता मंजिल तक नहीं मिलता हैं, और न ही चलते समय बैलो का आपस में कोई विवाद। यह सब हमें क्या सबक सिखाता हैं। जय आदिवासी युवा शक्ति का अपना मूल मंत्र " एक तीर एक कमान सभी आदिवासी एक समान" पर चलने का एक प्रेरित माध्यम हैं। हम आदिवासियों के कितने भी संगठन क्यों न हो, हम आपस में कितनी ही कड़वाहट घोल लें परंतु हम उन दो बैलो की तरह एक अनुशासन, एक लयबद्ध चलते रहे तथा मंजिल प्राप्ति पर फिर से मिल जाएँ न की उन दो रास्तों की तरह रहे जो मंजिल पर जाकर भी नहीं मिलते। हमारी विचारधारा कैसी भी क्यों न हो हमारा रहन सहन अलग क्यों न हो फिर भी हमारी सोच एक हैं हमारी मंजिल की प्राप्ति एक हैं। आप अपने संगठन को भूलकर केवल आदिवासी समाज के कल्याण की बातें करें और यही आगे चलकर साबित भी करना हैं। मैं इस आलेख के माध्यम से आदिवासी समाज के सभी संगठनों स आह्वान करता हूँ की "आदिवासी एकता परिषद् मध्यप्रदेश" द्वारा 23 वाँ आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन दिनांक 14-15 जनवरी 2016 को झिरन्या जिला खरगोन में आयोजित किया जा रहा हैं।

इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए जरूर उपस्थित हो। अभी तक मध्यप्रदेश के आदिवासी समाजजन ने दूसरे राज्य में जाकर "आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन" को सफल बनाने की महती भूमिका निभाई हैं, परंतु अब चूँकि यह कार्यक्रम हमारे घर में अर्थात् मध्यप्रदेश में आयोजित हो रहा हैं अतएव अब हमारी जिम्मेदारी अधिक हो गई हैं। सभी आदिवासी समाज संगठन एकता का परिचय देकर इस महासम्मेलन को सफल बनाने के लिए मैं आप सभी का आह्वान करता हूँ। हमारी बदनावर जयस टीम इस कार्यक्रम को तन, मन और धन से सहयोग प्रदान करेंगी यह मैं पूर्ण विश्वास दिलाता हूँ।

@जय आदिवासी समाजजन@
प्रस्तुति, अपील एवं निवेदक~
मोहनलाल डॉवर जयस विकास परिषद् बदनावर आप आदिवासी समाज से संबंधित मेरे आलेख आदिवासी समाज की अधिकृत वेबसाइट aadivasisamaj.com पर भी पढ़ सकते हैं।

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