''आदि-धर्म'' हे संदेह से परमानेंट मुक्ति का मार्ग।

संदेह पैदा क्यों न हो दुनिया में, संदेह पैदा होता है, झूठी श्रद्धा थोप देने के कारण। छोटा बच्चा है, तुम कहते हो मंदिर चलो। छोटा बच्चा पुछता है किस लिए?
अभी मैं खेल रहा हूं, तुम कहते हो, मंदिर में और ज्यादा आनंद आएगा।
और छोटे बच्चे को वह आनंद नहीं आता, तुम तो श्रद्धा सिखा रहे हो और बच्चा सोचता है, ये कैसा आनंद, यहां बड़े-बड़े बैठे है उदास,यहां दोड भी नहीं सकता, खेल भी नहीं सकता। नाच भी नहीं सकता, चीख पुकार नहीं कर सकता, यह कैसा आनंद। फिर बाप कहता है, झुको, यह भगवान की मूर्ति है। बच्चा कहता है भगवान यह तो पत्थर की मूर्ति को कपड़े पहना रखे है। झुको अभी, तुम छोटे हो अभी तुम्हारी बात समझ में नहीं आएगी। ध्यान रखना तुम सोचते हो तुम श्रद्धा पैदा कर रहे हो, वह बच्चा सर तो झुका लेगा लेकिन जानता है, कि यह पत्थर की मूर्ति है। उसे न केवल इस मूर्ति पर संदेह आ रहा है। अब तुम पर भी संदेह आ रहा है, तुम्हारी बुद्धि पर भी संदेह आ रहा है। अब वह सोचता है ये बाप भी कुछ मूढ़ मालूम होता है। कह नहीं सकता, कहेगा, जब तुम बूढे हो जाओगे, मां-बाप पीछे परेशान होते है, वे कहते है कि क्या मामला है। बच्चा हम पर श्रद्धा क्यों नहीं रखते, तुम्हीं ने नष्ट करवा दी श्रद्धा। तुम ने ऐसी-ऐसी बातें बच्चे पर थोपी, बच्चो का सरल ह्रदय तो टुट गया। उसके पीछे संदेह पैदा हो गया, झूठी श्रद्धा कभी संदेह से मुक्तं होती ही नहीं। झूठी श्र्द्धा संदेह की जन्मदात्री है। झूठी श्रद्धा के पीछे आता है संदेह।
''आदि-धर्म'' हे संदेह से परमानेंट मुक्ति का मार्ग।

प्रो. एम. एल. गरासिया
 

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