आदिवासी के जीवन को क्या हो गया है?

हम आदिवासियों के जीवन में इतना दुख है, इतनी पीड़ा, इतना तनाव कि ऐसा मालूम पड़ता है कि शायद पशु भी हमसे ज्यादा आनंद में होंगे, ज्यादा शांति में होंगे। समुद्र और पृथ्वी भी शायद हमसे ज्यादा प्रफुल्लित हैं। रद्दी से रद्दी जमीन में भी फूल खिलते हैं। गंदे से गंदे सागर में भी लहरें आती हैं--खुशी की, आनंद की। लेकिन आदिवासी के जीवन में न फूल खिलते हैं, न आनंद की कोई लहरें आती हैं।
आदिवासी के जीवन को क्या हो गया है? यह आदिवासी की इतनी अशांति और दुख की दशा क्यों है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि आदिवासी जो होने को पैदा हुआ है वही नहीं हो पाता है, जो पाने को पैदा हुआ है वही नहीं उपलब्ध कर पाता है, इसीलिए आदिवासी इतना दुखी है? अगर कोई बीज वृक्ष न बन पाए तो दुखी होगा। अगर कोई सरिता सागर से न मिल पाए तो दुखी होगी। कहीं ऐसा तो नहीं है कि आदिवासी जो वृक्ष बनने को है वह नहीं बन पाता है और जिस सागर से मिलने के लिए आदिवासी की आत्मा बेचैन है, उस सागर से भी नहीं मिल पाती है, इसीलिए आदिवासी दुख में हो?

''आदि-धर्म'' आदिवासी को उस वृक्ष बनाने की कला का नाम है जो वृक्ष बनने को वह भारतवर्ष में अस्तित्व में हे ,जिस वृक्ष की छाँव में एक दिन सम्पूर्ण भारतवर्ष आराम पायेगा ,जिसकी फूलो की खुशबु से समस्त विश्व महकेगा ।

प्रो. एम. एल. गरासिया
 

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