आदिवासियों कि आबादी घटना भी कम चिंताजनक बात नहीं है

दुनिया कि आबादी बढ़ना बहुत चिंताजनक है, तो आदिवासियों कि आबादी घटना भी कम चिंताजनक बात नहीं है UNO ( यु. एन.ओ) के आंकड़े बताते है, आज दुनिया के अलग- अलग हिस्सों में 37 करोड़ आदिवासी रह रहे है, भारत में आदिवासी बच्चों कि मृत्यु दर 35.8 है। जबकि राष्टीय औसत दर 18.4 फीसदी है।

UNO ( यु. एन.ओ) के आंकड़े बताते है, आज दुनिया के अलग- अलग हिस्सों में 37 करोड़ आदिवासी रह रहे है, भारत में आदिवासी समूह 705 है। 2011 में 10 करोड़ से ज्यादा संख्या दर्ज की गई है। वर्तमान में पूरा आदिवासी समाज ही व्यवस्था का शिकार है। इलाज के अभाव में आये दिन बच्चे ओर महिलाये मौत के मुह में समा रहे है। एक आकड़े के मुताबिक आदिवासी बच्चों कि मृत्यु दर राष्टीय औसत से दुगने स्तर पर पहुच गई है।

एक रिपोर्ट से उदघाटित हुआ है। आदिवासी बच्चों कि मृत्यु दर 35.8 है। जबकि राष्टीय औसत दर 18.4 फीसदी है। इसी तरह जनजाति शिशु मृत्यु दर 62.1 फीसदी है। जबकि राष्टीय शिशु मृत्युदर 57 फीसदी है।

गौर करे तो यह आकड़ा भारत कि सांस्कृतिक विविधता पर मंडराते किसी खतरे से कम नहीं है।

विगत वर्ष यु. एन.ओ. ( UNO ) कि "द स्टेट ऑफ़ वल्ड्स इंडिजीनस पीपल्स" नामक रिपोर्ट में कहा गया कि मुलवंशी आदिम जनजातियां भारत समेत सम्पूर्ण विश्व में अपनी सम्पदा, संसाधन और जमीन से वंचित विस्थापित होकर विलुप्त होने कि कगार पर है। रिपोर्ट में कहा गया है,की खनन कार्य के कारण हर रोज हजारो आदिवासी परिवार विस्थापित हो रहे है, उनकी सुध नहीं ली जा रही है।

विस्थापन के कारण उनमे गरीबी, बीमारी, अशिक्षा और बेरोजगारी बढ़ रही है। विगत महीने पहले प्रकाशित "नेशनल फेमिली हेल्थ सर्विस" से खुलासा हुआ है। इन राज्यो में विशिष्ट संवेदनशील आदिवासी समूहों कि तादाद घट रही है। मुख्य कारण बीमारी और विस्थापन है। कोलम ( आंध्रप्रदेश- तेलंगाना ), कोरगा ( कर्नाटक), चोलानायकन ( केरल ), मल पाहाड़िया ( बिहार ), कोटा (तमिलनाडु), बिरहोर (उड़ीसा-छतीसगढ़ ), शोपेन अंडमान निकोबार) जनजाति समुदाय विलुप्तिकरण के कगार पर है।

भारत में कुपोषण, गरीबी और सेहत को बनाये रखने के लिये जरुरी संसाधनो के अभाव और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कारण आज आदिवासी समाज अमानवीय दशा में जीने को मजबूर है। अंडमान के जारवा 400 के आंकड़े तज सिमट गए है। खनन के कारण जनित बीमारिया:-- खनन से हवा, मिटटी और पानी के प्रदूषण से अनेक प्रकार कि बीमारिया हो रही है। इन क्षेत्रो में सिर्फ वायु प्रदूषण से फेफड़ो और सांस सम्बंधित बीमारिया तो होगी साथ ही दिल कि बीमारिया, कैंसर, बच्चों का सुस्त मानसिक विकास, समय से पहले बच्चों का जन्म तथा जन्म के बाद कुछ समय में मृत्यु, दिमांगी बीमारिया होना गहन चिंता का विषय है। छत्तीसगढ़ में पाँच संरक्षित जनजातिया :---- बिरहोर, पहाड़ी अबूझमाड़िया, बेगा, कोरबा और कमार की आबादी लगातार कम हुई है। असुर जनजाति के तो अब सिर्फ 305 लोग बचे है। राज्यो कि सात जिलो जशपुर, सुकमा,बीजापुर, नारायणपुर, दन्तेवाड़ा, कांकेर ओर कोरिया कि आबादी काफी हद तक गिरी है। 30 फीसदी आबादी वाले इस राज्य में नक्सल प्रभावित इलाको में वृध्दि दर तेजी से घटी है। 2001 कि जनगणना में यह दर 19.30 फीसदी थी, लेकिन 2011 में घटकर 8.76 फीसदी रह गई है। लुप्तप्रायः बिरहोर 401 तक सिमट कर रह गई है ।

परिवार नियोजन कार्यक्रम चोरी छीपे चल रहा है। 25 अक्टुम्बर 1980 को वन- संरक्षण अधिनियम लागु किया गया। इस कानून कि मंजूरी ने लाखो आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया। सेकड़ो वर्षो से जिस भूमि को वे अपनी मातृभूमि समझकर सहजते- सवारते रहे है। वह उनके हाथो से निकल गई है। अपनी जमीन पर वे पराये हो गए है, येनकेन प्रकरणों में फसाकर आदिवासियों कि जमीन हड़पकर पूंजीपतियो को दिया जा रहा है, लिहाज आदिवासी समाज में आक्रोश उपजने लगा है। कुछ सरकारे भी आदिवासियों पर आपराधिक मुकदमे ठोकने लगी है। इस स्थिति ने जंगल का माहोल ख़राब कर दिया है। कुछ लोग इसका फायदा उठा रहे है।

आज स्थिति यह है की आदिवासी समाज ठगा मेहसूस कर रहा है। उनके पास न तो जीविका का कोई साधन रह गया है। न ही रोजगार कि सम्भावना है। वनो की आंधाधुंध कटाई जारी है। सरकार को स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याओ के अलावा सामाजिक समस्याओ पर गौर फरमाना चाहिये। सास्कृतिक ग्रहण लग गया है। संस्कृति और सभ्यताये दोनों को नहीं बचा पा रहे है। 2006 मे केंद्र सरकार ने वनाधिकार मान्यता कानून को पारित किया। इस कनून का मकसद आदिवासियों को उनका हक और अधिकार देना था। लेकिन कानून के जटिल प्रावधानों ने मुश्किलें ओर बड़ा दी है । इस कारणो से कानून में बदलाव कि मांग कर रहे है। कल तक जंगल के राजा थे, लेकिन आज मौत को गले लगाने को मजबूर है। पुनर्वास सम्बंधित नीतिया भी स्पष्ट नहीं है, रोजी-रोटी के लिये रोजगार के लिये नायाब तरीका नहीं है। जिम्मेदार नेतृत्व और सिस्टम नींद कि गोलिया लेकर सो रहे है। सत्ता कि नोटंकी में 27 प्रकार कि प्रमाणित योजनाओ का दम निकल रहा है। यहाँ पर संवेदनहीनता और लापरवाही उजगार हो रही है। स्वास्थ्य सेवाओ के अभाव में कही नसबंदी के शिकार में मर रहे है, कही आँख फोड़कांड के चपट में आँखों कि रौशनी गायब हो रही है। बेरोजगार युवको पर बेरहमी कि लठिया बरसाई जा रही है। महाविद्यालयो में सीटे होने के बावजूद भी प्रवेश नहीं मिल रहे है। जिम्मेदार लोग अपनी जवाबदेही से बच रहे है। राज्य और समाज को झुटे सच का आईना दिखा रहे है। अपनी दुनिया में मस्त और कम जरुरतो में खुश रहने वाले आदिवासियों पर आधुनिकीकरण की मार भी पड़ रही है। इनके परिवेश में दूसरे समुदायो का प्रवेश हो रहा है। प्रतिरक्षात्मक क्षमता घट रही है। जिससे उनकी मृत्यु दर लगातार बढ़ रही है। बाजरा, कोदों, कुटकी, भादि, कुलथु, बट्टी, साव जेसे पारंपरिक भोजन खत्म होने कि कगार पर है।

54 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार है । बाजरा में प्रचुर मात्रा में आइरन होता है। विकृत विचारधारा के प्रभाव में वनो, रीतिरिवाज, पेड़- पौंधे, भोजन, भाषा को नष्ट कर रहे है। खेती के साथ-साथ पारंपरिक भोजन भी खत्म होने कि कगार पर है।

विक्रम अछालिया जयस कोर कमेटी मध्यप्रदेश $------ जय जयस -------$

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