2021 की जनगणना में कौनसा शब्द लिखवायें ?

भारत का आदिवासी समुदाय एक लम्बें अरसे से अपने लिये अलग धर्म कोड, जगगणना में अलग से धर्म काॅलम प्राप्त करने की मांग कर रहा है। पिछले एक दशक से लगातार रैलियां, सभाएं, सेमिनार, जन-जागरण होने के बाद भी 2021 की जनगणना में 12 करोड़ से अधिक आदिवासी समुदाय के लोगों को कोई भी धर्म कोड़ नहीं मिल पाया हैं।


आखिर क्या वजह है ? कारण है जिससे एक धर्म कोड नही मिल पा रहा है।
केन्द्र सरकार कोई भी धर्म कोड़ क्यों नही दे पा रही है?
अगर धर्मकोड मिलेगा तो कैसे?
कौनसा धर्म कोड लेना चाहिये?
2021 की जनगणना में कौनसा शब्द लिखवायें


आईये इन सवालों का जबाव ढुढ़ने का प्रयास करते है।

दोस्तों, हमारा प्रयास रहता है कि आप तक आदिवासी समाज से जुडी हुई महत्वपूर्ण जानकारी लगातार पहुचाई जाये।

दोस्तों, 1871 से लेकर 1941 तक आदिवासियों के लिये अन्य धर्मों से अलग खुद का एक धर्म कोड़ हुआ करता था जिसे कहा #Aborgines, #Aborigional, #Animist, #TriabalReligion, #Tribes गया था।

1951 की जनगणना से आदिवासियों धर्म कोड़ खत्म कर दिया गया। जिससे आज भारत के 12 करोड़ से अधिक आदिवासी धर्म कोड की मांग के संघर्ष कर रहे है।

1951 के बाद से जनगणना में धर्मकोड नही होने से आदिवासियों की गिनती हिन्दु, ईसाई, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, सिख आदि धर्मों में होने लगी। जिससे आदिवासी समुदाय बिना कहे इन अन्य धर्मों में स्वतः धर्मान्तरित होता गया।


आज आदिवासी के लिये कहने के लिये और कानूनी रुप से अपना कोई स्पष्ट धर्म कोड नही है।
भील समुदाय भील धर्म तो गोण्ड़ समुदाय गोण्डी धर्म कहता है। वही कोई सरना तो कही मुण्डा धर्म की बात करता है। कोई आदि धर्म, तो कोई कोया पुनेम धर्म की बात करता है। कही पर प्रकृति धर्म तो कही पर इंडिजिनस धर्म लिखवाने की बात आती है।
वहीं उरावं, मुण्डा, खड़िया, चेरो, लोहरा भी अपने अपने अलग धर्म की बात करते है।
कोई भी एक धर्म कोड़ नही होने से पूरा भारत का आदिवासी समुदाय एक नहीं हो पा रहा है।
क्या कारण है जिससे एक धर्म कोड पर सहमत नहीं हो रहे है ?
भारत के अलग अलग भूभाग में रहने से और अलग अलग आदिवासी समूदाय की भाषा, रिति-रिवाज और होना भी देश स्तर पर एक धर्म कोड़ नही मिलने का कारण है।
सभी समुदाय स्वयं को सवश्रैष्ठ मानते है। कोई भी एक धार्मिक विचारधारा पर आदिवासी समुदाय एकमत नही होना चाह रहे है।
भारत के सभी आदिवासी समुदाय चाहते है, कि उनकी धार्मिक आस्था का ही धर्म कोड़ दिया जाये।
2011 की जनगणना में अलग अलग धार्मिक आस्था कोड लिखवाने से सबकों अलग अलग धर्म कोड़ दिया भी गया था।
2011 की जनगणना के फोरमेट C-1 APPENDIX – 2011 DETAILS OF RELIGIOUS COMMUNITY SHOWN UNDER ‘OTHER RELIGIONS AND PERSUASIONS’ IN MAIN TABLE C-1

के डाटा को देखने पर पता चलता है कि जनगणना मंे इन अलग अलग आदिवासी धर्म को मानने वालों के लिये अलग अलग आदिवासी धर्म कोड दिये गये है।

यही एक मुख्य वजह है जिससे देश स्तर पर एक धर्म कोड नही मिल पा रहा है।

इसलिये जनगणना विभाग भी एक धर्म कोड नही दे रहा है।

अगर धर्मकोड मिलेगा तो कैसे ?
अगर देश स्तर पर आदिवासी की एक पहचान चाहिये तो हमें पहले मतभेदों को भुलाकर एक होना होगा।
सभी समुदायों को मिलकर एक देशव्यापी धर्मकोड धर्मशब्द पर एकमत होना होगा।

अगर भारत के सभी आदिवासी समुदाय मिलकर किसी एक काॅॅमन धर्म कोड की मांग करे तो फिर सरकार को एक कोई भी धर्म कोड देना ही होगा। इसलिये पहले मनभेद, भाषाभेद, मतभेद, भूलाकर एक होना होगा।
दोस्तों वक्त आ गया है कि एक स्वर में 2021 की जनगणना में आदिवासी के लिये एक अलग धर्म कोड की मांग की जाये।

2021 में कौनसा धर्म कोड होना चाहिये।
कौनसे धर्म कोड की मांग करना सही रहेगा।
जो भारत के सभी आदिवासी समुदाय अपना सके।
आदिवासी प्रकृति पूजक रहा है।
आदिवासी सूर्य, चन्द्रमा, तारे, प्रकृति आदि की पूजा करते है।
आदिवासी समुदाय अपने धार्मिक आस्था में जीवीत प्रकृती पूजते है।
इसलिये धर्म कोड में काॅमन शब्द आदिवासी धर्म या ट्राईबल लिखा जाना उचित रहेगा।
धर्म में आदिवासी लिखवाने से देश स्तर पर एकता आ पायेगी। आदिवासी शब्द एक संवैधानिक शब्द है और कानूनी रुप से मान्य भी है। न्यायालयों में विभिन्न फैसलों में आदिवासी शब्द प्रयुक्त किया जाता है।

देश के आदिवासियों भाईयों अब एक होेने का वक्त आ गया है कि धर्म कोड में काॅमन शब्द आदिवासी धर्म या ट्राईबल लिखा जाये और एक धर्म कोड की बात की जाये।

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